ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 41

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।

English Meaning

Here, O joy of the Kurus, there is but a single one-pointed determination; many-branched and endless are the thoughts of the irresolute.

Here, O joy of the Kurus, there is but a single one-pointed determination; many-branched and endless are the thoughts of the irresolute.

आगे पढ़ें — सांख्य योग के सभी श्लोक · श्रीमद्भगवद्गीता