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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 64

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

English Meaning

But the self-controlled man, moving among the objects with the senses under restraint and free from attraction and repulsion, attains to peace.

But the self-controlled man, moving among the objects with the senses under restraint and free from attraction and repulsion, attains to peace.

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