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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 107

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥107॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जब तक कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तब तक करोड़ों उपाय करने से भी, स्वप्न में भी वह सुख नहीं पाता॥107॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 107 अयोध्या काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik