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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 131

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥131॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है॥131॥

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