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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 158

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहि जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥158॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

नगर के लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं, गौं से (चुपके से) जोहार (वंदना) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसी से कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद छा रहा है॥158॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 158 अयोध्या काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik