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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 183

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस॥183॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

यद्यपि मेरा जन्म कुमाता से हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्री रामजी का भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं॥183॥

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