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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 193

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥193॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

दण्डवत करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। हृदय में प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजी से भेंट हो गई हो॥193॥

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