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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 215

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार। तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार॥215॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

सम्पत्ति (भोग-विलास की सामग्री) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनि की आज्ञा खेल है, जिसने उस रात को आश्रम रूपी पिंजड़े में दोनों को बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। (जैसे किसी बहेलिए के द्वारा एक पिंजड़े में रखे जाने पर भी चकवी-चकवे का रात को संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजी की आज्ञा से रात भर भोग सामग्रियों के साथ रहने पर भी भरतजी ने मन से भी उनका स्पर्श तक नहीं किया।)॥215॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 215 अयोध्या काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik