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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 225

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु। कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥225॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

भरतजी का उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते। कवि के लिए तो वह वैसा ही अगम है, जैसा अहंता और ममता से मलिन मनुष्यों के लिए ब्रह्मानंद!॥225॥

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