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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 288

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥288॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

भरतजी असीम गुण सम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजी के समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वत को क्या सेर के बराबर कह सकते हैं? इसलिए (उन्हें किसी पुरुष के साथ उपमा देने में) कवि समाज की बुद्धि भी सकुचा गई!॥288॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 288 अयोध्या काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik