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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 303

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि॥303॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

भरतजी का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कवि की सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में उस चन्द्रमा को उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाए देखती ही रह गई है (तब उसका वर्णन कौन करे?)॥303॥

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