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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 48

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥48॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

चन्द्रमा चाहे (शीतल किरणों की जगह) आग की चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विष के समान हो जाए, परन्तु भरतजी स्वप्न में भी कभी श्री रामचन्द्रजी के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे॥48॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 48 अयोध्या काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik