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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 87

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरितकरत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥87॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणों से रहित, मायातीत दिव्य मंगलविग्रह) सच्चिदानंद-कन्द स्वरूप सूर्य कुल के ध्वजा रूप भगवान श्री रामचन्द्रजी मनुष्यों के सदृश ऐसे चरित्र करते हैं, जो संसार रूपी समुद्र के पार उतरने के लिए पुल के समान हैं॥87॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 87 अयोध्या काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik