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श्रीरामचरितमानस · किष्किन्धा काण्ड

दोहा 26

किष्किन्धा काण्ड · Kishkindha Kaand

मूल पाठ

निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर मह गो ‍द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥26॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

देवता, पृथ्वी, गो और ब्राह्मणों के लिए प्रभु अपनी इच्छा से (किसी कर्मबंधन से नहीं) अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक (भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारुप्य, सार्ष्टि और सायुज्य) सब प्रकार के मोक्षों को त्यागकर उनकी सेवा में साथ रहते हैं॥26॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 26 किष्किन्धा काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik