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श्रीरामचरितमानस · सुन्दर काण्ड

दोहा 4

सुन्दर काण्ड · Sundar Kaand

मूल पाठ

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥4॥

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