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श्रीरामचरितमानस · उत्तर काण्ड

उत्तर काण्ड दोहा 2

उत्तर काण्ड · Uttar Kaand

मूल पाठ

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥ रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥2॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुण समूहों की पंक्तियों को आप निरंतर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक, सज्जनों को दुःख देने वाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक श्री रामजी सकुशल आ गए॥2॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 2 उत्तर काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik