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श्रीरामचरितमानस · उत्तर काण्ड

उत्तर काण्ड दोहा 44

उत्तर काण्ड · Uttar Kaand

मूल पाठ

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥44॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागर से न तरे, वह कृतघ्न और मंद बुद्धि है और आत्महत्या करने वाले की गति को प्राप्त होता है॥44॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 44 उत्तर काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik