केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं। शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्॥ पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं। नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥1॥
अर्थ: मोर के कण्ठ की आभा के समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमल नेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथों में बाण और धनुष धारण किए हुए, वानर समूह से…