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श्रीरामचरितमानस · उत्तर काण्ड

उत्तर काण्ड दोहा 65

उत्तर काण्ड · Uttar Kaand

मूल पाठ

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग। बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभ अगस्ति सतसंग॥65॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिस प्रकार विराध का वध हुआ और शरभंगजी ने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कहकर, फिर सुतीक्ष्णजी का प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजी का सत्संग वृत्तान्त कहा॥65॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 65 उत्तर काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik