ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
स्कन्ध 12

श्रीमद्भागवतम्द्वादश स्कन्ध

कुल 13 अध्याय

अध्याय 1

कलियुगके राजवंशोंका वर्णन

इस अध्यायमें राजा परीक्षित् श्रीकृष्णके स्वधामगमनके बाद पृथ्वीपर राज्य करनेवाले राजवंशोंके विषयमें पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी प्रद्योत, शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, कण्व, आभीर, यवन आदि अनेक राजवंशोंका क्रम, उनके राज्यकाल और कलियुगमें राजाओं तथा…

5 मिनट का पाठ999 शब्द
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अध्याय 2

कलियुगके धर्म

इस अध्यायमें कलियुगके धर्म और दोषोंका वर्णन है। श्रीशुकदेवजी धर्म, सत्य, पवित्रता, आयु और स्मरणशक्तिके ह्रास, समाज और राजधर्मके पतन, कल्किभगवान्के अवतार, सत्ययुगके पुनः प्रारम्भ और राजाओंकी क्षणभंगुरता का वर्णन करते हैं।

8 मिनट का पाठ1,411 शब्द
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अध्याय 3

राज्य, युगधर्म और कलियुगके दोषोंसे बचनेका उपाय—नामसंकीर्तन

इस अध्यायमें पृथ्वीके दृष्टिकोणसे राजाओंकी ममता और राज्याभिलाषाकी व्यर्थता कही गयी है। इसके बाद परीक्षित् कलियुगके दोषोंसे बचनेका उपाय पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी युगधर्म, कलियुगके सामाजिक और नैतिक दोष तथा भगवान् श्रीकृष्णके नाम-संकीर्तनकी महिमा बताते हैं।

11 मिनट का पाठ2,002 शब्द
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अध्याय 4

चार प्रकारके लय

इस अध्यायमें श्रीशुकदेवजी नैमित्तिक, प्राकृत, आत्यन्तिक और नित्य प्रलयका वर्णन करते हैं। वे कालकी सूक्ष्म गति, तत्त्वोंके क्रमशः लय, आत्मा और मायाके भेद तथा भगवान् नारायणकी लीला-कथाके आश्रयत्वको समझाते हैं।

8 मिनट का पाठ1,584 शब्द
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अध्याय 5

श्रीशुकदेवजीका अन्तिम उपदेश

इस अध्यायमें श्रीशुकदेवजी परीक्षित्को आत्मस्वरूपमें स्थित रहनेका अन्तिम उपदेश देते हैं। वे शरीर, जन्म-मृत्यु, माया, मन और आत्माके भेदको समझाकर परीक्षित्को निर्भय होकर परब्रह्ममें स्थित होनेके लिये कहते हैं।

3 मिनट का पाठ534 शब्द
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अध्याय 6

परीक्षित्की परमगति, जनमेजयका सर्पसत्र और वेदोंके शाखाभेद

इस अध्यायमें परीक्षित्की परमगति, तक्षकदंश, जनमेजयके सर्पसत्र और बृहस्पतिजीके उपदेशका वर्णन है। आगे शौनकजीके प्रश्नपर सूतजी वेदोंकी उत्पत्ति, ॐकारका स्वरूप, व्यासजीद्वारा वेद-विभाजन तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी शाखाओंका क्रम बताते हैं।

14 मिनट का पाठ2,648 शब्द
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अध्याय 7

अथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण

इस अध्यायमें सूतजी अथर्ववेदकी शाखाओं और उनके आचार्योंका वर्णन करते हैं। इसके बाद पुराणोंके आचार्य, पुराणोंके दस और पाँच लक्षण, अठारह पुराणोंके नाम तथा वेद-पुराण परम्पराके अध्ययन-अध्यापनका क्रम बताया गया है।

4 मिनट का पाठ759 शब्द
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अध्याय 8

मार्कण्डेयजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति

इस अध्यायमें शौनकजी मार्कण्डेय ऋषिके चिरायु होने और प्रलय-दर्शनके विषयमें प्रश्न करते हैं। सूतजी मार्कण्डेयजीकी तपस्या, इन्द्रद्वारा भेजे गये विघ्नोंकी असफलता, नर-नारायणके प्रकट होने और मार्कण्डेयजीकी स्तुति का वर्णन करते हैं।

10 मिनट का पाठ1,999 शब्द
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अध्याय 9

मार्कण्डेयजीका माया-दर्शन

इस अध्यायमें मार्कण्डेय मुनि भगवान् नर-नारायणसे उनकी माया देखनेका वर माँगते हैं। भगवान्की योगमायासे वे प्रलयका अद्भुत दृश्य, वटपत्रपर स्थित दिव्य बालमुकुन्द और उनके उदरमें सम्पूर्ण विश्वका दर्शन करते हैं।

7 मिनट का पाठ1,312 शब्द
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अध्याय 10

मार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान

इस अध्यायमें मार्कण्डेय मुनि भगवान् शंकरकी शरण, दर्शन और स्तुति करते हैं। भगवान् शंकर मार्कण्डेयजीको अचल भक्ति, यश, अमरत्व, त्रिकालज्ञान, वैराग्य और पुराणाचार्यत्वका वरदान देते हैं।

8 मिनट का पाठ1,428 शब्द
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अध्याय 11

भगवान्के अंग, उपांग और आयुध का रहस्य तथा विभिन्न सूर्यगण का वर्णन

इस अध्यायमें भगवान्के विराट् अंग, उपांग, आयुध, आभूषण और चतुर्व्यूह रूपोंका रहस्य बताया गया है। आगे बारह महीनोंमें सूर्यके साथ रहनेवाले विभिन्न देवगणोंका नाम और कार्य वर्णित है।

7 मिनट का पाठ1,385 शब्द
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अध्याय 12

श्रीमद्भागवतकी संक्षिप्त विषय-सूची

इस अध्यायमें श्रीमद्भागवतके बारहों स्कन्धोंकी विषय-सूची, भगवान्की लीला-कथा और भागवत-श्रवण-कीर्तनकी महिमा का संक्षिप्त वर्णन है।

10 मिनट का पाठ2,000 शब्द
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अध्याय 13

विभिन्न पुराणोंकी श्लोक-संख्या और श्रीमद्भागवतकी महिमा

इस अध्यायमें अठारह पुराणोंकी श्लोक-संख्या, श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय, प्रयोजन, दान-पाठकी महिमा और श्रीमद्भागवतकी सर्वश्रेष्ठता का वर्णन है।

4 मिनट का पाठ722 शब्द
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