ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
स्कन्ध 11

श्रीमद्भागवतम्एकादश स्कन्ध

कुल 31 अध्याय

अध्याय 1

यदुवंशको ऋषियोंका शाप

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारनेके बाद यदुवंशके उपसंहारका संकल्प करते हैं। परीक्षित् यदुवंशको ब्राह्मणोंके शापका कारण पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी बताते हैं कि यदुवंशके उद्दण्ड कुमारोंने साम्बको स्त्री-वेषमें सजाकर ऋषियोंसे छलपू…

5 मिनट का पाठ927 शब्द
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अध्याय 2

वसुदेवजीके पास श्रीनारदजीका आना और उन्हें राजा जनक तथा नौ योगीश्वरका संवाद सुनाना

इस अध्यायमें नारदजी वसुदेवजीको भागवतधर्मका माहात्म्य बताते हैं और राजा निमि तथा नौ योगीश्वरोंका संवाद सुनाते हैं। कवि योगीश्वर भागवतधर्मका स्वरूप बताते हैं, जिसमें भगवान् नारायणको समस्त कर्म अर्पित करना, गुरुको आराध्य मानकर भजन करना और भगवा…

11 मिनट का पाठ2,165 शब्द
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अध्याय 3

माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण

इस अध्यायमें राजा निमि माया, उससे पार होनेके उपाय, नारायणके परम स्वरूप और कर्मयोगके विषयमें प्रश्न करते हैं। अन्तरिक्षजी माया और प्रलयका वर्णन करते हैं, प्रबुद्धजी गुरु-शरण, भागवतधर्म और भक्ति-साधन बताते हैं, पिप्पलायनजी नारायणके परब्रह्मस्…

13 मिनट का पाठ2,558 शब्द
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अध्याय 4

भगवान्के अवतार का वर्णन

इस अध्यायमें राजा निमि भगवान्की लीलाओं और अवतारोंका वर्णन सुनना चाहते हैं। द्रुमिलजी भगवान्के अनन्त गुणोंका निरूपण करते हुए पुरुषावतार, नर-नारायण, हंस, दत्तात्रेय, ऋषभ, हयग्रीव, मत्स्य, वराह, कूर्म, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध…

6 मिनट का पाठ1,183 शब्द
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अध्याय 5

भक्तिहीन पुरुषोंकी गति और भगवान्की पूजा-विधिका वर्णन

इस अध्यायमें राजा निमि भगवान्का भजन न करनेवालोंकी गति पूछते हैं। चमसजी भक्तिहीन, कर्मकाण्डमें फँसे और विषयासक्त पुरुषोंकी अधोगति बताते हैं। फिर करभाजनजी सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुगमें भगवान्के भिन्न-भिन्न नाम, रूप और पूजा-विधिका वर्णन कर…

11 मिनट का पाठ2,001 शब्द
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अध्याय 6

देवताओंकी भगवान्से स्वधाम सिधारनेके लिये प्रार्थना तथा यादवोंको प्रभासक्षेत्र जानेकी तैयारी करते देखकर उद्धवका भगवान्के पास आना

इस अध्यायमें देवता और ब्रह्माजी द्वारका आकर भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हैं और उनसे पृथ्वीका भार उतारनेका कार्य पूर्ण हो जानेपर स्वधाम पधारनेकी प्रार्थना करते हैं। भगवान् बताते हैं कि यदुवंशका संहार भी अभी शेष है। इसके बाद द्वारकामें उत्…

10 मिनट का पाठ1,935 शब्द
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अध्याय 7

अवधूतोपाख्यान - पृथ्वीसे लेकर कबूतरतक आठ गुरुओंकी कथा

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजीको संसारकी नश्वरता, इन्द्रियनिग्रह, समदृष्टि और आत्मज्ञानका उपदेश देते हैं। उद्धवजी त्यागका साधन पूछते हैं। भगवान् मनुष्य-शरीरकी महत्ता बताकर अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदुका संवाद सुनाते हैं। दत्तात्रेय अ…

16 मिनट का पाठ3,023 शब्द
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अध्याय 8

अवधूतोपाख्यान - अजगरसे लेकर पिंगलातक नौ गुरुओंकी कथा

इस अध्यायमें अवधूत दत्तात्रेय अजगर, समुद्र, पतिंगा, भौंरा, मधुमक्खी, हाथी, मधुहारी, हिरन, मछली और पिंगला वेश्यासे मिली शिक्षाएँ बताते हैं। मुख्य शिक्षा यह है कि विषयोंकी आशा दुःखका कारण है, संग्रह और आसक्ति बन्धन हैं, इन्द्रिय-वशता पतन करात…

9 मिनट का पाठ1,793 शब्द
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अध्याय 9

अवधूतोपाख्यान - कुररसे लेकर भृंगीतक सात गुरुओंकी कथा

इस अध्यायमें अवधूत दत्तात्रेय कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनानेवाले, साँप, मकड़ी, भृंगी कीट और अपने शरीरसे ली गयी शिक्षाएँ बताते हैं। इन शिक्षाओंका सार है कि संग्रह दुःखका कारण है, एकान्त और एकाग्रता साधकके लिये हितकर हैं, आसक्ति छो…

7 मिनट का पाठ1,372 शब्द
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अध्याय 10

लौकिक तथा पारलौकिक भोगोंकी असारताका निरूपण

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजीको निष्काम स्वधर्म, गुरुसेवा, आत्मा और देहकी भिन्नता तथा लौकिक-पारलौकिक भोगोंकी असारता समझाते हैं। वे बताते हैं कि स्वर्गादि सुख भी क्षयशील और दोषयुक्त हैं, सकाम कर्म दुःखका कारण हैं और आत्मज्ञानसे ही भ्…

10 मिनट का पाठ1,837 शब्द
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अध्याय 11

बद्ध, मुक्त और भक्तजनोंके लक्षण

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण बद्ध और मुक्त जीवका भेद, जीवन्मुक्तके लक्षण, निष्फल वाणी और भक्तियोगका मार्ग बताते हैं। उद्धवजी संत और भक्ति लक्षण पूछते हैं। भगवान् संतके गुण और भक्तिकी विधियाँ बताते हैं, जिनमें भगवान् और भक्तोंकी सेवा, कथा-श…

10 मिनट का पाठ1,847 शब्द
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अध्याय 12

सत्संगकी महिमा और कर्म तथा कर्मत्यागकी विधि

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण सत्संगकी महिमा, गोपियोंके प्रेम, सर्वत्यागपूर्वक भगवान्की शरणागति, वाणीके चार रूप, समस्त कर्म-करण-कर्ताके भगवान्मय स्वरूप और संसारवृक्षके विवेचन द्वारा कर्मत्याग तथा आत्मस्थितिका उपदेश देते हैं।

6 मिनट का पाठ1,149 शब्द
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अध्याय 13

हंसरूपसे सनकादिको दिये हुए उपदेशका वर्णन

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण सत्त्व, रज और तमके विवेक, विषयासक्ति और मनोनिग्रहका उपाय, सनकादि ऋषियोंके प्रश्न और हंसरूप भगवान्के आत्मतत्त्व सम्बन्धी उपदेशका वर्णन करते हैं। इसमें चित्त-विषय त्याग, तीन अवस्थाओंका विवेचन, तुरीयस्थितिका मार्ग…

9 मिनट का पाठ1,621 शब्द
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अध्याय 14

भक्तियोगकी महिमा तथा ध्यानविधिका वर्णन

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान्से अनेक साधनोंमें श्रेष्ठ साधन पूछते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण भक्तियोगकी निरपेक्ष महिमा बताते हैं, वेदवाणीकी परम्परा और विभिन्न मतोंका कारण समझाते हैं, अनन्य भक्तकी स्थिति और भक्ति द्वारा चित्तशुद्धि बताते हैं। अन्तम…

9 मिनट का पाठ1,659 शब्द
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अध्याय 15

भिन्न-भिन्न सिद्धियोंके नाम और लक्षण

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण अठारह सिद्धियोंके नाम, उनके लक्षण और उन्हें प्राप्त करनेवाली धारणाओंका वर्णन करते हैं। वे अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, कामावसायिता तथा अन्य योगसिद्धियोंका विवेचन करते हैं और अंतमें…

7 मिनट का पाठ1,341 शब्द
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अध्याय 16

भगवान्की विभूतियोंका वर्णन

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान्से उनकी विभूतियोंका वर्णन पूछते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके प्रसंगका स्मरण कराते हुए बताते हैं कि वे समस्त प्राणियोंके आत्मा, नियामक और कारण हैं। वे देवताओं, ऋषियों, तत्वों, गुणों, शक्तियों, काल, वेद, तीर्थ, आश…

6 मिनट का पाठ1,146 शब्द
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अध्याय 17

वर्णाश्रम-धर्म-निरूपण

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान्से वर्णाश्रम-धर्मका विधान पूछते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण हंसवर्ण, वेद और आश्रमोंकी उत्पत्ति, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्त्यजोंके स्वभाव, सब वर्णोंके सामान्य धर्म, ब्रह्मचारीके नियम, गृहस्थधर्म, आपत्कालीन…

10 मिनट का पाठ1,922 शब्द
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अध्याय 18

वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म बताते हैं। वानप्रस्थके आहार, वास, तप, यज्ञ और संन्यास-ग्रहणकी विधि बतायी गयी है। संन्यासीके लिये अपरिग्रह, सत्य, मौन, त्रिदण्ड, भिक्षा, एकान्तवास, आत्मचिन्तन, वैराग्य, गुरुसेवा और व…

9 मिनट का पाठ1,745 शब्द
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अध्याय 19

भक्ति, ज्ञान और यम-नियमादि साधनोंका वर्णन

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान, विज्ञान, भक्तियोग और यम-नियमादि साधनोंका वर्णन करते हैं। उद्धवजीके प्रश्नोंके उत्तरमें भगवान् भक्ति प्राप्तिके साधन, धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्यकी परिभाषा तथा यम, नियम, शम, दम, दान, तप, सत्य, संन्यास, सुख…

9 मिनट का पाठ1,612 शब्द
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अध्याय 20

ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग

इस अध्यायमें उद्धवजी वेदोंके विधि-निषेध और गुण-दोषके विषयमें प्रश्न करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोगके अधिकारियोंका वर्णन करते हुए मनुष्य-शरीरकी दुर्लभता, मनोनिग्रहकी विधि और अनन्य भक्तिकी महिमा बताते हैं।

8 मिनट का पाठ1,430 शब्द
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अध्याय 21

गुण-दोष-व्यवस्थाका स्वरूप और रहस्य

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण गुण-दोषकी व्यवस्था, शुद्धि-अशुद्धि, देश-काल-पदार्थ-अधिकारीके भेद और वेदवाणीके गूढ़ तात्पर्यका वर्णन करते हैं। भगवान् बताते हैं कि गुण-दोष अधिकारानुसार हैं, विषयासक्ति बन्धनका कारण है और श्रुतियोंका अंतिम आशय पर…

10 मिनट का पाठ1,907 शब्द
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अध्याय 22

तत्त्वोंकी संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक

इस अध्यायमें उद्धवजी तत्त्वोंकी भिन्न-भिन्न संख्याओं और पुरुष-प्रकृति-विवेकके विषयमें प्रश्न करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि विभिन्न गणनाएँ तत्त्वोंके परस्पर अन्तर्भावके कारण युक्तिसंगत हैं, प्रकृति और पुरुष भिन्न हैं, लिंगशरीर कर्म…

13 मिनट का पाठ2,465 शब्द
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अध्याय 23

एक तितिक्षु ब्राह्मणका इतिहास

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण तितिक्षु ब्राह्मणका इतिहास सुनाते हैं। उज्जैनके कृपण ब्राह्मणका धन नष्ट होनेपर उसमें वैराग्य जागता है, वह संन्यासी बनता है और अपमान सहते हुए मनको ही सुख-दुःखका कारण बताता है। भगवान् निष्कर्ष देते हैं कि मनको वश…

12 मिनट का पाठ2,371 शब्द
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अध्याय 24

सांख्ययोग

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजीको सांख्ययोगका निर्णय सुनाते हैं। वे बताते हैं कि ब्रह्म अद्वितीय सत्य है, माया और जीवके कारण दृश्य-द्रष्टाका भेद प्रतीत होता है, प्रकृति-पुरुषके संयोगसे सृष्टि चलती है और कालरूप परमात्मा कर्मानुसार फल द…

5 मिनट का पाठ879 शब्द
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अध्याय 25

तीन गुणोंकी वृत्तियोंका निरूपण

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण सत्त्व, रज और तम तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका निरूपण करते हैं। वे बताते हैं कि चित्तसे जुड़े गुण जीवको देह, कर्म और भोगमें बाँधते हैं, पर मनुष्यशरीर पाकर विवेक, इन्द्रियनिग्रह, भक्ति और निरपेक्षताके द्वारा इन गुणो…

6 मिनट का पाठ1,111 शब्द
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अध्याय 26

पुरूरवाका वैराग्य

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजीको असत्संगसे बचने और संतसंगकी महिमा बताते हैं। वे पुरूरवा और उर्वशीका प्रसंग सुनाते हैं, जिसमें मोहसे ग्रस्त पुरूरवाके भीतर वैराग्य जागता है और वह देहासक्ति, विषयासक्ति तथा स्त्रीसंगके दोषोंका विचार करके…

7 मिनट का पाठ1,260 शब्द
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अध्याय 27

क्रियायोगका वर्णन

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णसे क्रियायोग और आराधना-विधि पूछते हैं। भगवान् वैदिक, तान्त्रिक और मिश्रित पूजा-पद्धति, प्रतिमा-पूजन, न्यास, ध्यान, उपचार, हवन, स्तुति, विसर्जन, मन्दिर-निर्माण और निष्काम भक्तियोगका वर्णन करते हैं।

9 मिनट का पाठ1,757 शब्द
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अध्याय 28

परमार्थनिरूपण

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण परमार्थदृष्टि, अद्वैतभाव, आत्मा-अनात्मा विवेक और जगत्की मिथ्याताका निरूपण करते हैं। वे बताते हैं कि जन्म-मृत्यु और विकार अहंकारसे सम्बद्ध हैं, आत्मा नित्य और स्वयंप्रकाश है, तथा भक्तियोग और आत्मविचारसे मनका मल…

12 मिनट का पाठ2,242 शब्द
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अध्याय 29

भागवतधर्मोंका निरूपण और उद्धवजीका बदरिकाश्रमगमन

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णसे सरल साधन पूछते हैं। भगवान् भागवतधर्मोंका निरूपण करते हुए सभी प्राणियोंमें भगवान्को देखने, समभाव, निष्काम कर्मसमर्पण, सत्संग, ज्ञान-भक्ति और संवादश्रवणकी महिमा बताते हैं। अंतमें वे उद्धवजीको बदरिकाश्रम…

10 मिनट का पाठ1,812 शब्द
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अध्याय 30

यदुकुलका संहार

इस अध्यायमें परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्णके यदुकुलके अन्त और दिव्य विग्रहके संवरणके विषयमें प्रश्न करते हैं। श्रीशुकदेवजी प्रभासक्षेत्रमें यदुवंशियोंके पारस्परिक संहार, बलरामजीकी परमगति, भगवान् श्रीकृष्णके पीपलतले विराजने, जरा व्याधके प्रसंग…

8 मिनट का पाठ1,518 शब्द
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अध्याय 31

श्रीभगवान्का स्वधामगमन

इस अध्यायमें दारुकके जानेके बाद देवताओंका आगमन, भगवान् श्रीकृष्णका स्वधामगमन, द्वारकाके लोगोंका शोक, अर्जुनद्वारा यदुवंशियोंके श्राद्ध और वज्रके राज्याभिषेकका वर्णन है। अध्यायके अंतमें श्रीकृष्णकी लीलाओंके श्रद्धापूर्वक कीर्तनका फल बताया गया है।

4 मिनट का पाठ798 शब्द
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