ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
स्कन्ध 10

श्रीमद्भागवतम्दशम स्कन्ध

कुल 89 अध्याय

अध्याय 1

भगवान्के द्वारा पृथ्वीको आश्वासन, वसुदेव-देवकीका विवाह और कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या

इस अध्यायमें परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंके विषयमें प्रश्न करते हैं। श्रीशुकदेवजी पृथ्वीके भारसे पीड़ित होकर ब्रह्माजीकी शरण जाने, देवताओंको यदुवंशमें जन्म लेनेकी आज्ञा, वसुदेव-देवकीके विवाह, कंसको आकाशवाणीसे भय होने, वसुदेवजीके उपदे…

12 मिनट का पाठ2,383 शब्द
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अध्याय 2

भगवान्का गर्भ-प्रवेश और देवताओंद्वारा गर्भ-स्तुति

इस अध्यायमें कंसद्वारा यदुवंशियोंको सताये जाने, भगवान्के आदेशसे योगमायाद्वारा देवकीके गर्भसे शेषजीको रोहिणीके गर्भमें स्थापित करने, भगवान्के देवकीके गर्भमें प्रवेश, कंसके भय और चिन्तन तथा ब्रह्मादि देवताओंकी गर्भ-स्तुति का वर्णन है।

9 मिनट का पाठ1,716 शब्द
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अध्याय 3

भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्णके प्राकट्यका शुभ समय, देवकीके गर्भसे उनके चतुर्भुज दिव्यरूपका प्रकट होना, वसुदेव और देवकीकी स्तुतियाँ, भगवान्द्वारा अपने पूर्वजन्मोंका स्मरण कराना और वसुदेवजीका बालक श्रीकृष्णको गोकुल ले जाकर यशोदाजीकी कन्याको…

10 मिनट का पाठ1,897 शब्द
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अध्याय 4

कंसके हाथसे छूटकर योगमायाका आकाशमें जाकर भविष्यवाणी करना

इस अध्यायमें कंसका नवजात कन्याको मारनेका प्रयास, योगमायाका आकाशमें जाकर कंसको भविष्यवाणी देना, कंसका देवकी-वसुदेवसे क्षमा माँगना और फिर दुष्ट मन्त्रियोंकी सलाहसे ब्राह्मण, गौ और संतोंके विरुद्ध हिंसा करनेका निर्णय वर्णित है।

8 मिनट का पाठ1,465 शब्द
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अध्याय 5

गोकुलमें भगवान्का जन्ममहोत्सव

इस अध्यायमें नन्दबाबाके घर भगवान् श्रीकृष्णके जन्मोत्सव, दान, मंगल-गान, गोप-गोपियोंके आनन्द, रोहिणीजीके सत्कार, नन्दबाबाका मथुरा जाकर कर देना और वहाँ वसुदेवजीसे उनका प्रेमपूर्ण मिलन वर्णित है।

6 मिनट का पाठ1,008 शब्द
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अध्याय 6

पूतना-उद्धार

इस अध्यायमें पूतना राक्षसीके गोकुलमें आकर बालक श्रीकृष्णको विष पिलानेके प्रयास, भगवान्के द्वारा उसके उद्धार, गोपियोंकी रक्षा-विधि और पूतना-मोक्षकी महिमा वर्णित है।

7 मिनट का पाठ1,393 शब्द
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अध्याय 7

शकट-भंजन और तृणावर्त-उद्धार

इस अध्यायमें परीक्षित्के प्रश्नके बाद श्रीकृष्णकी करवट-उत्सव लीला, शकट-भंजन, तृणावर्तका उद्धार और यशोदाजीद्वारा बालक श्रीकृष्णके मुखमें जगत्-दर्शनका वर्णन है।

7 मिनट का पाठ1,249 शब्द
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अध्याय 8

नामकरण-संस्कार और बाललीला

इस अध्यायमें गर्गाचार्यजीके गोकुल आगमन, बलराम और श्रीकृष्णके नामकरण, दोनों भाइयोंकी बाललीलाओं, माखन-चोरीकी शिकायत, श्रीकृष्णके मुखमें विश्व-दर्शन और नन्द-यशोदाके पूर्वजन्मका वर्णन है।

11 मिनट का पाठ2,131 शब्द
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अध्याय 9

श्रीकृष्णका ऊखलसे बाँधा जाना

इस अध्यायमें यशोदाजीके दही मथने, श्रीकृष्णके दूध पीनेकी लीला, दहीका मटका तोड़ने, माखन बाँटने, यशोदाजीद्वारा उन्हें पकड़कर ऊखलसे बाँधने और नलकूबर-मणिग्रीवके उद्धारकी भूमिका वर्णित है।

5 मिनट का पाठ899 शब्द
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अध्याय 10

यमलार्जुनका उद्धार

इस अध्यायमें नलकूबर और मणिग्रीवके मद, देवर्षि नारदके शाप-अनुग्रह, भगवान् श्रीकृष्णद्वारा यमलार्जुन वृक्षोंके उद्धार, मुक्त यक्षोंकी स्तुति और भगवान्के उपदेशका वर्णन है।

8 मिनट का पाठ1,483 शब्द
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अध्याय 11

गोकुलसे वृन्दावन जाना तथा वत्सासुर और बकासुरका उद्धार

इस अध्यायमें यमलार्जुन वृक्षोंके गिरनेके बाद व्रजवासियोंका आश्चर्य, श्रीकृष्णकी बाललीलाएँ, गोकुलसे वृन्दावन गमन, वत्सासुर और बकासुरके उद्धार तथा व्रजवासियोंके प्रेमपूर्ण आश्चर्यका वर्णन है।

10 मिनट का पाठ1,963 शब्द
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अध्याय 12

अघासुरका उद्धार

इस अध्यायमें श्रीकृष्णके साथ ग्वालबालोंकी वनक्रीड़ा, अघासुरका अजगररूप धारण करना, ग्वालबालोंका उसके मुखमें प्रवेश, श्रीकृष्णद्वारा उनका उद्धार, अघासुरको मोक्ष और परीक्षित् द्वारा इस लीलाके रहस्यपर प्रश्न करनेका वर्णन है।

10 मिनट का पाठ1,853 शब्द
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अध्याय 13

ब्रह्माजीका मोह और उसका नाश

इस अध्यायमें श्रीकृष्णके वनभोजन, ब्रह्माजीद्वारा बछड़ों और ग्वालबालोंको छिपाना, भगवान्का स्वयं उनके रूपमें प्रकट होकर व्रजवासियोंको आनन्द देना, बलरामजीका रहस्य जानना और ब्रह्माजीका मोह दूर होकर भगवान्की महिमा स्वीकार करना वर्णित है।

13 मिनट का पाठ2,586 शब्द
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अध्याय 14

ब्रह्माजीके द्वारा भगवान्की स्तुति

इस अध्यायमें ब्रह्माजी भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा स्वीकार करके उनकी स्तुति करते हैं, अपनी भूलके लिये क्षमा माँगते हैं, व्रजवासियोंके सौभाग्यका वर्णन करते हैं, फिर भगवान् ग्वालबालोंके पास लौटते हैं और परीक्षित्के प्रश्नपर श्रीशुकदेवजी आत्मप्रि…

15 मिनट का पाठ2,962 शब्द
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अध्याय 15

धेनुकासुरका उद्धार और ग्वालबालोंको कालियनागके विषसे बचाना

इस अध्यायमें श्रीकृष्ण और बलरामकी पौगण्ड अवस्था, वृन्दावनकी शोभा, ग्वालबालोंके साथ लीलाएँ, बलरामजीद्वारा धेनुकासुर और उसके साथियोंका उद्धार, तथा श्रीकृष्णद्वारा कालियनागके विषसे मृतप्राय गौओं और ग्वालबालोंको पुनर्जीवित करनेका वर्णन है।

9 मिनट का पाठ1,782 शब्द
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अध्याय 16

कालियपर कृपा

इस अध्यायमें श्रीकृष्ण यमुनाजीको कालिय नागके विषसे शुद्ध करनेके लिये कालियदहमें कूदते हैं, नागपाशसे छूटकर कालियके फणोंपर नृत्य करते हैं, नागपत्नियाँ उनकी स्तुति करके कालियके लिये क्षमा माँगती हैं, और भगवान् कालियको रमणकद्वीप जानेकी आज्ञा दे…

15 मिनट का पाठ2,871 शब्द
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अध्याय 17

कालियके कालियदहमें आनेकी कथा तथा भगवान्का व्रजवासियोंको दावानलसे बचाना

इस अध्यायमें परीक्षित् कालियके कालियदहमें आनेका कारण पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी गरुड़ और कालियकी कथा, सौभरि ऋषिके शाप, कालियके रमणकद्वीप भेजे जाने, श्रीकृष्णके सुरक्षित लौटनेपर व्रजवासियोंके आनन्द और रातमें दावानलसे भगवान् द्वारा व्रजवासियोंकी…

4 मिनट का पाठ722 शब्द
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अध्याय 18

लम्बासुर-उद्धार

इस अध्यायमें ग्रीष्म ऋतुमें भी वृन्दावनकी वसन्तमयी शोभा, श्रीकृष्ण-बलराम और ग्वालबालोंकी क्रीड़ाएँ, ग्वालवेषधारी लम्बासुरका प्रवेश, खेलके बहाने बलरामजीको ले जाकर हरनेका उसका प्रयास, और बलरामजीद्वारा लम्बासुर-वधका वर्णन है।

6 मिनट का पाठ1,140 शब्द
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अध्याय 19

गौ और गोपोंको दावानलसे बचाना

इस अध्यायमें ग्वालबालोंके खेलमें लग जानेपर गौओंका गहन मुंजाटवीमें चले जाना, श्रीकृष्णद्वारा उन्हें पुकारकर लौटाना, दावानलसे घिर जानेपर ग्वालों और गौओंका श्रीकृष्ण-बलरामकी शरण लेना, और भगवान् श्रीकृष्णद्वारा दावानल पीकर सबकी रक्षा करना वर्णित है।

3 मिनट का पाठ533 शब्द
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अध्याय 20

वर्षा और शरद्ऋतुका वर्णन

इस अध्यायमें दावानल और लम्बासुर-वधकी कथा सुनकर व्रजवासियोंका आश्चर्य, वर्षा ऋतुके आगमन और उसके अनेक आध्यात्मिक दृष्टान्तों सहित वर्णन, श्रीकृष्ण-बलरामकी वर्षाकालीन वनक्रीड़ा, तथा वर्षा समाप्त होनेपर शरद् ऋतुकी निर्मलता और सौन्दर्यका वर्णन है।

9 मिनट का पाठ1,618 शब्द
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अध्याय 21

वेणुगीत

इस अध्यायमें शरद् ऋतुके सुन्दर वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका वर्णन है। गोपियाँ श्रीकृष्णके रूप, वंशी, गायों, पक्षियों, नदियों, बादलों, भीलनियों और गिरिराज गोवर्धनपर पड़े उनके प्रेमपूर्ण प्रभावका आपसमें गान करती हैं।

8 मिनट का पाठ1,540 शब्द
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अध्याय 22

चीरहरण

इस अध्यायमें व्रजकुमारियोंके कात्यायनी-व्रत, यमुनातटपर भगवान् श्रीकृष्णद्वारा उनकी साधना पूर्ण कराने और उन्हें भविष्यमें शरद्-रात्रियोंमें विहारका आश्वासन देनेका वर्णन है। अंतमें भगवान् ग्वालबालोंको वृक्षोंके परोपकारी जीवनका उपदेश देते हुए…

7 मिनट का पाठ1,255 शब्द
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अध्याय 23

यज्ञपत्नियों पर कृपा

इस अध्यायमें भूखे ग्वालबालोंको भगवान् श्रीकृष्ण पहले यज्ञ कर रहे ब्राह्मणोंके पास भेजते हैं, पर वे उन्हें अन्न नहीं देते। फिर ब्राह्मणपत्नियाँ प्रेमपूर्वक भोजन लेकर श्रीकृष्णके पास आती हैं। भगवान् उन्हें दर्शन देकर लौटा देते हैं और अंतमें ब…

10 मिनट का पाठ1,995 शब्द
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अध्याय 24

इन्द्रयज्ञ-निवारण

इस अध्यायमें नन्दबाबा इन्द्रयज्ञकी परम्परा बताते हैं और भगवान् श्रीकृष्ण कर्म, स्वभाव और गोपालनधर्मका तर्क देकर इन्द्रयज्ञके स्थानपर गौ, ब्राह्मण और गिरिराज गोवर्धनकी पूजा करानेका उपदेश देते हैं। व्रजवासी श्रीकृष्णकी प्रेरणासे गिरिराजका पूजन करते हैं।

6 मिनट का पाठ1,108 शब्द
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अध्याय 25

गोवर्धनधारण

इस अध्यायमें इन्द्र अपने यज्ञके रुकनेसे क्रोधित होकर सांवर्तक मेघोंसे व्रजपर प्रचण्ड वर्षा कराते हैं। व्रजवासी श्रीकृष्णकी शरण लेते हैं और भगवान् श्रीकृष्ण सात दिनतक गोवर्धन पर्वत धारण करके सबकी रक्षा करते हैं। इन्द्रका गर्व टूट जाता है और…

5 मिनट का पाठ993 शब्द
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अध्याय 26

नन्दबाबासे गोपोंकी श्रीकृष्णके प्रभावके विषयमें बातचीत

इस अध्यायमें गोपगण श्रीकृष्णके अद्भुत बाल्यकर्मोंको याद करके नन्दबाबासे उनके स्वरूपके विषयमें पूछते हैं। नन्दबाबा गर्गाचार्यके पूर्व कथनका स्मरण कराते हैं कि श्रीकृष्ण नारायणके समान गुणोंवाले हैं और व्रजका कल्याण करने आये हैं।

5 मिनट का पाठ853 शब्द
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अध्याय 27

श्रीकृष्णका अभिषेक

इस अध्यायमें इन्द्र अपने अपराधपर लज्जित होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करते हैं। भगवान् इन्द्रका गर्व तोड़नेको अनुग्रह बताते हैं। फिर कामधेनु और इन्द्र श्रीकृष्णका अभिषेक करके उन्हें गोविन्द नामसे सम्बोधित करते हैं, जिससे तीनों लोकोंमें आनन्द फैल जाता है।

5 मिनट का पाठ971 शब्द
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अध्याय 28

वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना

इस अध्यायमें नन्दबाबा द्वादशी-स्नानके समय वरुणके सेवकद्वारा वरुणलोक ले जाये जाते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें छुड़ाकर लाते हैं। वरुण भगवान्की स्तुति करते हैं और बादमें श्रीकृष्ण गोपोंको मायातीत परमधामका दर्शन कराते हैं।

4 मिनट का पाठ601 शब्द
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अध्याय 29

रासलीलाका आरम्भ

इस अध्यायमें शरद् पूर्णिमाकी रात्रिमें श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और गोपियाँ सब काम छोड़कर उनके पास आती हैं। भगवान् पहले उन्हें लौटनेका उपदेश देते हैं, पर गोपियाँ अपने अनन्य प्रेमकी व्यथा कहती हैं। भगवान् उनके साथ रासक्रीड़ाका आरम्भ करते ह…

13 मिनट का पाठ2,526 शब्द
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अध्याय 30

श्रीकृष्णके विरहमें गोपियोंकी दशा

इस अध्यायमें श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर गोपियोंकी विरहावस्था, उनका वृक्षों-लताओंसे श्रीकृष्णका पता पूछना, उनकी बाललीलाओंका अनुकरण करना, चरणचिह्नोंसे उनका मार्ग ढूँढ़ना और अन्ततः यमुनातटपर लौटकर श्रीकृष्णके गुणोंका गान करना वर्णित है।

9 मिनट का पाठ1,717 शब्द
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अध्याय 31

गोपिकागीत

इस अध्यायमें विरह-विह्वल गोपियाँ श्रीकृष्णके गुण, रूप, वाणी, चरण, अधर और लीलाकथा का स्मरण करते हुए करुण गीत गाती हैं। वे अपने सम्पूर्ण समर्पण, विरहपीड़ा और श्रीकृष्णके दर्शन व सान्निध्यकी तीव्र आकांक्षा व्यक्त करती हैं।

6 मिनट का पाठ1,018 शब्द
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अध्याय 32

भगवान्का प्रकट होकर गोपियोंको सान्त्वना देना

इस अध्यायमें विरह-विह्वल गोपियोंके बीच श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं और उनके दर्शनसे गोपियोंका शोक मिट जाता है। यमुनातटपर बैठकर गोपियाँ श्रीकृष्णसे प्रेमके भेद पूछती हैं। भगवान् उत्तर देते हैं कि उन्होंने गोपियोंका प्रेम और अधिक एकाग्र करनेके लि…

6 मिनट का पाठ1,096 शब्द
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अध्याय 33

महारास

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ दिव्य महारास, नृत्य, जलविहार और वनविहार करते हैं। परीक्षित् इस लीला पर प्रश्न करते हैं और श्रीशुकदेवजी भगवान्की चिन्मय, निर्लिप्त और जीवकल्याणकारी लीला का तात्त्विक समाधान देते हैं।

9 मिनट का पाठ1,749 शब्द
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अध्याय 34

सुदर्शन और शंखचूडका उद्धार

इस अध्यायमें नन्दबाबा आदि गोप शिवरात्रिके अवसरपर अम्बिकावन जाते हैं। वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अजगररूप सुदर्शन विद्याधरका उद्धार करते हैं। इसके बाद शंखचूड नामक यक्ष गोपियोंको ले जानेका प्रयास करता है और भगवान् श्रीकृष्ण उसका वध कर उसकी चूड़ामणि बलरामजीको देते हैं।

6 मिनट का पाठ1,015 शब्द
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अध्याय 35

युगलगीत

इस अध्यायमें गोपियाँ दिनके समय वन गये हुए भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करती हैं और उनकी बाँसुरी, वनविहार, सौन्दर्य, गोचारण, व्रजप्रेम तथा संध्याकालीन आगमनका भावपूर्ण गान करती हैं।

9 मिनट का पाठ1,617 शब्द
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अध्याय 36

अरिष्टासुरका उद्धार और कंसका श्रीअक्रूरजीको व्रज भेजना

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण व्रजको भयभीत करनेवाले अरिष्टासुरका वध करते हैं। इसके बाद नारदजी कंसको कृष्ण और बलरामके जन्मका रहस्य बताते हैं। कंस क्रोधित होकर देवकी-वसुदेवको फिर कारागारमें डालता है, केशीको व्रज भेजता है और अक्रूरजीको कृष्ण-ब…

7 मिनट का पाठ1,289 शब्द
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अध्याय 37

केशी और व्योमासुरका उद्धार तथा नारदजीके द्वारा भगवान्की स्तुति

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण केशी दैत्यका वध करते हैं। देवर्षि नारद भगवान्की स्तुति करते हुए उनके आगामी पराक्रमोंका वर्णन करते हैं। इसके बाद भगवान् व्योमासुरका वध करके गुफामें बंद किये गये ग्वालबालोंको बचाते हैं।

7 मिनट का पाठ1,277 शब्द
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अध्याय 38

अक्रूरजीकी व्रजयात्रा

इस अध्यायमें अक्रूरजी मथुरासे व्रजकी यात्रा करते हुए भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनकी उत्कट अभिलाषा और भक्तिभावमें डूबे रहते हैं। व्रज पहुँचकर वे भगवान्के चरणचिह्नोंकी रजमें लोटते हैं, श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शन करते हैं और दोनों भाइयोंसे प्रेमपूर्ण सत्कार पाते हैं।

10 मिनट का पाठ1,814 शब्द
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अध्याय 40

अक्रूरजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति

इस अध्यायमें अक्रूरजी भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए उन्हें समस्त कारणोंके कारण, नारायण, विश्वरूप, सभी उपासना-पथोंके परम लक्ष्य और विभिन्न अवतारोंके अधिष्ठान बताते हैं। अन्तमें वे अपनी मोहग्रस्त अवस्था स्वीकार करके भगवान्के चरणोंमें शरण…

6 मिनट का पाठ1,169 शब्द
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अध्याय 41

श्रीकृष्णका मथुराजीमें प्रवेश

इस अध्यायमें अक्रूरजीके दिव्य दर्शनके बाद श्रीकृष्ण-बलराम मथुरापुरीमें प्रवेश करते हैं। नगरकी स्त्रियाँ और निवासी उनका दर्शन कर आनन्दित होते हैं। आगे भगवान् कंसके अभिमानी धोबीका दमन करते हैं, दर्जीको वर देते हैं और सुदामा मालीके प्रेमपूर्ण…

9 मिनट का पाठ1,729 शब्द
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अध्याय 42

कुब्जापर कृपा, धनुषभंग और कंसकी घबड़ाहट

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण कुब्जापर कृपा कर उसे सुन्दर और सीधा रूप देते हैं। फिर वे धनुष-यज्ञस्थल जाकर महान् धनुष तोड़ते हैं और रक्षकोंका संहार करते हैं। कंस इन घटनाओंसे भयभीत होकर अनेक अपशकुन देखता है और अगले दिन मल्ल-क्रीड़ा महोत्सव आरम्भ कराता है।

6 मिनट का पाठ1,192 शब्द
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अध्याय 43

कुवलयापीडका उद्धार और अखाड़ेमें प्रवेश

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण रंगभूमिके द्वारपर कुवलयापीड हाथी और उसके महावतोंका वध करते हैं। वे बलरामजीके साथ हाथीके दाँत लेकर अखाड़ेमें प्रवेश करते हैं, जहाँ दर्शक उनके स्वरूप और पूर्व लीलाओंका स्मरण करते हैं। अंतमें चाणूर उन्हें मल्लयुद्धके लिये ललकारता है।

6 मिनट का पाठ1,194 शब्द
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अध्याय 44

चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार

इस अध्यायमें श्रीकृष्ण और बलराम चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका वध करते हैं। इसके बाद कंस श्रीकृष्णको मारनेका आदेश देता है, पर श्रीकृष्ण मंचपर चढ़कर कंसका उद्धार करते हैं। कंसके भाइयोंका भी वध होता है, देवता आनन्द मनाते हैं, और अंतमें श्रीकृष…

9 मिनट का पाठ1,689 शब्द
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अध्याय 45

श्रीकृष्ण-बलरामका यज्ञोपवीत और गुरुकुलप्रवेश

इस अध्यायमें श्रीकृष्ण माता-पिताको सान्त्वना देते हैं, उग्रसेनको यदुवंशका राजा बनाते हैं और नन्दबाबा तथा व्रजवासियोंको सम्मान देकर विदा करते हैं। वसुदेवजी श्रीकृष्ण-बलरामका यज्ञोपवीत संस्कार कराते हैं। दोनों सान्दीपनि मुनि के गुरुकुलमें विद…

8 मिनट का पाठ1,486 शब्द
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अध्याय 46

उद्धवजीकी व्रजयात्रा

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजीको व्रज भेजते हैं, ताकि वे नन्द-यशोदा और विरहसे व्याकुल गोपियोंको उनका सन्देश दें। उद्धवजी संध्याके समय व्रज पहुँचते हैं, नन्दबाबा उनका आदर करते हैं और श्रीकृष्णकी स्मृतियोंसे भाव-विह्वल हो जाते हैं। उद्…

10 मिनट का पाठ1,836 शब्द
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अध्याय 47

उद्धव तथा गोपियोंकी बातचीत और भ्रमरगीत

इस अध्यायमें उद्धवजी व्रजकी गोपियोंसे मिलते हैं। गोपियाँ श्रीकृष्णके वियोगमें भ्रमरसे बात करती हुई अपने विरह, शिकायत और प्रेमको व्यक्त करती हैं। उद्धवजी उन्हें श्रीकृष्णका सन्देश सुनाते हैं, जिससे उन्हें शान्ति मिलती है। व्रजमें कई महीने रह…

19 मिनट का पाठ3,605 शब्द
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अध्याय 48

भगवान्का कुब्जा और अक्रूरजीके घर जाना

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण कुब्जाके घर जाकर उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं और फिर उद्धवजीके साथ लौट आते हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण, बलरामजी और उद्धवजी अक्रूरजीके घर जाते हैं। अक्रूरजी भगवान्की पूजा और स्तुति करते हैं। अंतमें श्रीकृष्ण अक्रूरजीको…

7 मिनट का पाठ1,334 शब्द
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अध्याय 49

अक्रूरजीका हस्तिनापुर जाना

इस अध्यायमें अक्रूरजी भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे हस्तिनापुर जाते हैं और वहाँ धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर, कुन्ती तथा पाण्डवोंसे मिलते हैं। वे पाण्डवोंपर हो रहे अन्यायका समाचार जानते हैं। कुन्ती श्रीकृष्णकी शरणागत प्रार्थना करती हैं। अक्रूरजी धृ…

6 मिनट का पाठ1,084 शब्द
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अध्याय 50

जरासन्धसे युद्ध और द्वारकापुरीका निर्माण

इस अध्यायमें कंसकी रानियोंके दुःखसे प्रेरित होकर जरासन्धका मथुरापर आक्रमण, श्रीकृष्ण-बलरामद्वारा उसकी सेना का संहार, जरासन्धको छोड़ देना, कालयवनकी चढ़ाई और यदुवंशियोंकी रक्षा के लिये समुद्रमें द्वारकापुरीके निर्माणका वर्णन है।

11 मिनट का पाठ2,003 शब्द
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अध्याय 51

कालयवनका भस्म होना, मुचुकुन्दकी कथा

इस अध्यायमें कालयवन भगवान् श्रीकृष्णका पीछा करते हुए गुफामें पहुँचता है और राजा मुचुकुन्दकी दृष्टिसे भस्म हो जाता है। परीक्षित् मुचुकुन्दका परिचय पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी उनके पूर्व इतिहास, देवताओंसे मिले वर और भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनका वर्…

12 मिनट का पाठ2,264 शब्द
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अध्याय 52

द्वारकागमन, श्रीबलरामजीका विवाह तथा श्रीकृष्णके पास रुक्मिणीजीका सन्देशा लेकर ब्राह्मणका आना

इस अध्यायमें मुचुकुन्दके उत्तर दिशा जाने, श्रीकृष्णका मथुरा लौटकर कालयवनकी सेना नष्ट करना, जरासन्धसे बचकर द्वारका लौटना, बलरामजीका रेवतीसे विवाह और श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाहकी भूमिका आती है। विदर्भराज भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी श्रीकृष्णको पति…

8 मिनट का पाठ1,503 शब्द
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अध्याय 53

रुक्मिणीहरण

इस अध्यायमें रुक्मिणीजीका संदेश सुनकर श्रीकृष्णका दारुकके रथसे विदर्भ पहुँचना, कुण्डिनपुरमें विवाहोत्सवकी तैयारी, शिशुपाल और विरोधी राजाओंका आगमन, बलरामजीका सेना सहित पहुँचना, रुक्मिणीजीकी प्रतीक्षा और ब्राह्मणसे श्रीकृष्णके आगमनका समाचार प…

9 मिनट का पाठ1,742 शब्द
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अध्याय 54

शिशुपालके साथी राजाओंकी और रुक्मीकी हार तथा श्रीकृष्ण-रुक्मिणी-विवाह

इस अध्यायमें रुक्मिणीहरणके बाद शिशुपालके पक्षके राजाओंका यदुवंशियोंसे युद्ध, उनकी पराजय, जरासन्धद्वारा शिशुपालको समझाना, रुक्मीका श्रीकृष्णका पीछा करना और पराजित होकर अपमानित होना वर्णित है। रुक्मिणीजीके प्रार्थना करनेपर श्रीकृष्ण रुक्मीको…

10 मिनट का पाठ1,904 शब्द
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अध्याय 55

प्रद्युम्नका जन्म और शम्बरासुरका वध

इस अध्यायमें कामदेवके प्रद्युम्नरूपमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणीजीके पुत्र रूपमें जन्म, शम्बरासुरद्वारा उनका अपहरण, समुद्रमें फेंके जाने और मच्छके पेटसे मायावतीको प्राप्त होनेका वर्णन है। मायावती रति के रूपमें प्रद्युम्नको उनका वास्तविक स्वरूप…

7 मिनट का पाठ1,250 शब्द
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अध्याय 56

स्यमन्तकमणिकी कथा, जाम्बवती और सत्यभामाके साथ श्रीकृष्णका विवाह

इस अध्यायमें सत्राजित् को सूर्यसे स्यमन्तकमणि मिलना, उसपर श्रीकृष्णके विरुद्ध झूठा कलंक लगना, प्रसेन और सिंहकी मृत्यु, जाम्बवान्के पास मणि पहुँचना और श्रीकृष्ण-जाम्बवान् युद्धका वर्णन है। जाम्बवान् श्रीकृष्णको पहचानकर जाम्बवती और मणि अर्पित…

7 मिनट का पाठ1,314 शब्द
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अध्याय 57

स्यमन्तक-हरण, शतधन्वाका उद्धार और अक्रूरजीको फिरसे द्वारका बुलाना

इस अध्यायमें श्रीकृष्णके हस्तिनापुर जानेपर अक्रूर और कृतवर्मा द्वारा शतधन्वाको भड़काना, शतधन्वाद्वारा सत्राजित्का वध और स्यमन्तकमणिका हरण वर्णित है। श्रीकृष्ण शतधन्वाका पीछा कर उसका वध करते हैं, पर मणि नहीं मिलती। बलरामजी मिथिला जाते हैं। आ…

7 मिनट का पाठ1,333 शब्द
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अध्याय 58

भगवान् श्रीकृष्णके अन्यान्य विवाहोंकी कथा

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंसे मिलनेके लिये इन्द्रप्रस्थ जाना, कुन्ती और युधिष्ठिरसे संवाद, अर्जुनके साथ कालिन्दीसे भेंट और कालिन्दीका विवाह वर्णित है। आगे मित्रविन्दा, नाग्नजिती सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा सहित भगवान् श्रीकृष्णके…

9 मिनट का पाठ1,786 शब्द
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अध्याय 59

भौमासुरका उद्धार और सोलह हजार एक सौ राज-कन्याओंके साथ भगवान्का विवाह

इस अध्यायमें राजा परीक्षित् भौमासुर-वधकी कथा पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी भगवान् श्रीकृष्णका सत्यभामाके साथ प्राग्ज्योतिषपुर जाना, मुर दैत्य और भौमासुरका वध, पृथ्वीदेवीकी स्तुति, राजकुमारियोंकी मुक्ति, पारिजात-हरण और भगवान् श्रीकृष्णके सोलह हजार…

9 मिनट का पाठ1,744 शब्द
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अध्याय 60

श्रीकृष्ण-रुक्मिणी-संवाद

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीसे विनोदपूर्वक कठोर-सी बातें कहते हैं, जिससे रुक्मिणीजी व्याकुल हो जाती हैं। भगवान् उन्हें सान्त्वना देते हैं और रुक्मिणीजी भगवान्की महिमा, अपने अनन्य प्रेम तथा भगवान्के चरणोंमें शरणागति प्रकट करती है…

14 मिनट का पाठ2,731 शब्द
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अध्याय 61

भगवान्की सन्ततिका वर्णन तथा अनिरुद्धके विवाहमें रुक्मीका मारा जाना

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियों और उनके पुत्रोंका वर्णन है। फिर रुक्मवती और प्रद्युम्नके विवाह, अनिरुद्ध और रोचनाके विवाह तथा भोजकटमें बलरामजी और रुक्मीके चौसर प्रसंगका वर्णन है। रुक्मीके छल और उपहाससे क्रोधित होकर बलरामजी उसे मार…

6 मिनट का पाठ1,195 शब्द
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अध्याय 62

ऊषा-अनिरुद्ध-मिलन

इस अध्यायमें राजा परीक्षित् ऊषा और अनिरुद्धके प्रसंग तथा आगे होनेवाले श्रीकृष्ण-शंकर युद्धका कारण पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी बाणासुरकी शिवभक्ति, उसके अहंकार, ऊषाके स्वप्न, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धको शोणितपुर लाने, ऊषा-अनिरुद्ध मिलन और अंतमें ब…

7 मिनट का पाठ1,263 शब्द
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अध्याय 63

भगवान् श्रीकृष्णके साथ बाणासुरका युद्ध

इस अध्यायमें अनिरुद्धके बन्धनका समाचार पाकर यदुवंशियोंका शोणितपुरपर आक्रमण, श्रीकृष्ण और शंकरजीका युद्ध, माहेश्वर और वैष्णव ज्वरका संघर्ष, बाणासुरकी भुजाओंका छेदन, शंकरजीकी स्तुति और बाणासुरको अभयदानका वर्णन है। अंतमें अनिरुद्ध और ऊषा सहित…

9 मिनट का पाठ1,609 शब्द
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अध्याय 64

नृग राजाकी कथा

इस अध्यायमें यदुवंशी कुमारोंद्वारा कूएँमें गिरे गिरगिटको देखने, भगवान् श्रीकृष्णद्वारा उसके उद्धार, राजा नृगके दान, भूलसे हुई ब्राह्मणकी गायके दान, यमलोकमें पापफल भोगने और भगवान् श्रीकृष्णके ब्राह्मणधनके विषयमें दिये गये उपदेशका वर्णन है।

8 मिनट का पाठ1,467 शब्द
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अध्याय 65

श्रीबलरामजीका व्रजगमन

इस अध्यायमें भगवान् बलरामजीके व्रजगमन, नन्दबाबा-यशोदाजी और व्रजवासियोंसे मिलन, गोपियोंको श्रीकृष्णके सन्देशसे सान्त्वना, वारुणी-मधुका पान, यमुनाजीके आकर्षण और जलक्रीडा सहित व्रज-विहारका वर्णन है।

6 मिनट का पाठ1,036 शब्द
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अध्याय 66

पौण्ड्रक और काशिराजका उद्धार

इस अध्यायमें पौण्ड्रकके मिथ्या वासुदेव-अभिमान, श्रीकृष्णको भेजे गये उसके संदेश, भगवान् द्वारा पौण्ड्रक और काशिराजके वध, पौण्ड्रकको सारूप्य प्राप्त होने, सुदक्षिणके अभिचार और सुदर्शनचक्रद्वारा काशी-दहनका वर्णन है।

7 मिनट का पाठ1,284 शब्द
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अध्याय 67

द्विविदका उद्धार

इस अध्यायमें राजा परीक्षित् बलरामजीकी अन्य अद्भुत लीलाएँ सुनना चाहते हैं। श्रीशुकदेवजी द्विविद वानरके उपद्रव, रैवतक पर्वतपर बलरामजीका अपमान करनेकी उसकी चेष्टा और अंतमें भगवान् बलरामजीद्वारा उसके वधका वर्णन करते हैं।

4 मिनट का पाठ796 शब्द
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अध्याय 68

कौरवोंपर बलरामजीका कोप और साम्बका विवाह

इस अध्यायमें साम्बद्वारा दुर्योधनकी पुत्री लक्ष्मणाका हरण, कौरवोंद्वारा साम्बका बंदीकरण, यदुवंशियोंकी युद्ध-तैयारी, बलरामजीका शान्ति हेतु हस्तिनापुर जाना, कौरवोंके अपमानजनक वचन, बलरामजीका कोप और हलसे हस्तिनापुरको गंगाकी ओर खींचना तथा अंतमें…

9 मिनट का पाठ1,676 शब्द
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अध्याय 69

देवर्षि नारदजीका भगवान्की गृहचर्या देखना

इस अध्यायमें देवर्षि नारदजी भगवान् श्रीकृष्णकी योगमायाका दर्शन करने द्वारका जाते हैं। वे देखते हैं कि भगवान् एक ही समय अपनी प्रत्येक रानीके महलमें अलग-अलग गृहस्थधर्म, पूजा, दान, परामर्श, जलक्रीडा, विवाह आदि कार्य कर रहे हैं। अंतमें नारदजी भ…

8 मिनट का पाठ1,540 शब्द
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अध्याय 70

भगवान् श्रीकृष्णकी नित्यचर्या और उनके पास जरासन्धके कैदी राजाओंके दूतका आना

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातःकालीन नित्यचर्या, दान, सभा-प्रवेश और सुधर्मा-सभा का वर्णन है। उसी समय जरासन्धके बंदी राजाओंका दूत आकर उनकी मुक्ति की प्रार्थना करता है। तत्पश्चात् देवर्षि नारदजी युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञका संदेश देते हैं…

10 मिनट का पाठ1,882 शब्द
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अध्याय 71

श्रीकृष्णभगवान्का इन्द्रप्रस्थ पधारना

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णको पाण्डवोंके राजसूय-यज्ञ और जरासन्ध-वधके विषयमें परामर्श देते हैं। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण नारदजीको सम्मान देकर, बंदी राजाओंके दूतको आश्वासन देकर, रानियों और सेनाके साथ इन्द्रप्रस्थ पधारते हैं। वहाँ य…

8 मिनट का पाठ1,592 शब्द
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अध्याय 72

पाण्डवोंके राजसूययज्ञका आयोजन और जरासन्धका उद्धार

इस अध्यायमें धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णसे राजसूय-यज्ञका संकल्प पूरा करानेकी प्रार्थना करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उनके निश्चयकी प्रशंसा करके दिग्विजय और यज्ञकी तैयारीका निर्देश देते हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन ब्राह्मण-…

8 मिनट का पाठ1,598 शब्द
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अध्याय 73

जरासन्धके जेलसे छूटे हुए राजाओंकी बिदाई और भगवान्का इन्द्रप्रस्थ लौट आना

इस अध्यायमें जरासन्धके कारागारसे मुक्त हुए राजाओंका भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे आनन्दित होना और उनकी स्तुति करना वर्णित है। भगवान् उन्हें भक्ति, वैराग्य और धर्मपूर्वक प्रजापालनका उपदेश देते हैं, उनका सम्मान करवाकर उन्हें अपने-अपने राज्य भेजत…

6 मिनट का पाठ1,126 शब्द
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अध्याय 74

भगवान्की अग्रपूजा और शिशुपालका उद्धार

इस अध्यायमें धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा और कृपासे राजसूय-यज्ञका आयोजन करते हैं। यज्ञसभामें सहदेव भगवान् श्रीकृष्णको अग्रपूजाका अधिकारी बताते हैं और सब उनकी बातका समर्थन करते हैं। शिशुपाल भगवान्की निन्दा करता है, जिसके बाद भग…

8 मिनट का पाठ1,534 शब्द
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अध्याय 75

राजसूय यज्ञकी पूर्ति और दुर्योधनका अपमान

इस अध्यायमें राजा परीक्षित् दुर्योधनके दुःख और ईर्ष्याका कारण पूछते हैं। श्रीशुकदेवजी राजसूय यज्ञमें पाण्डवों और सम्बन्धियोंके सेवाकार्यों, अवभृथ-स्नान, उत्सव और सबके सत्कारका वर्णन करते हैं। अंतमें मयसभाकी माया से दुर्योधन जलको स्थल और स्थ…

7 मिनट का पाठ1,238 शब्द
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अध्याय 76

शाल्वके साथ यादवोंका युद्ध

इस अध्यायमें शिशुपालके सखा शाल्वकी प्रतिज्ञा, भगवान् शंकरसे प्राप्त सौभ विमान और द्वारकापर उसके आक्रमणका वर्णन है। प्रद्युम्नजी यादवोंके साथ युद्धमें उतरकर शाल्वकी माया नष्ट करते हैं, पर शाल्वका मन्त्री द्युमान् उन्हें गदासे घायल कर देता है…

5 मिनट का पाठ972 शब्द
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अध्याय 77

शाल्व-उद्धार

इस अध्यायमें प्रद्युम्नजी द्युमान्का वध करते हैं और श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थसे द्वारका लौटकर शाल्वसे युद्ध करते हैं। शाल्व भगवान्‌को मायासे भ्रमित करनेका प्रयास करता है, पर भगवान् उसकी माया पहचान लेते हैं। अन्ततः श्रीकृष्ण सौभ विमानको नष्ट कर…

6 मिनट का पाठ1,148 शब्द
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अध्याय 78

दन्तवक्त्र और विदूरथका उद्धार तथा तीर्थयात्रामें बलरामजीके हाथसे सूतजीका वध

इस अध्यायमें दन्तवक्त्र और विदूरथका वध तथा भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकाप्रवेश वर्णित है। आगे बलरामजी तीर्थयात्रा करते हुए नैमिषारण्य पहुँचते हैं, रोमहर्षण सूतका वध करते हैं और ऋषियोंके कहनेपर प्रायश्चित्तका विधान स्वीकार करते हैं।

6 मिनट का पाठ1,194 शब्द
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अध्याय 79

बल्वलका उद्धार और बलरामजीकी तीर्थयात्रा

इस अध्यायमें बलरामजी बल्वल दैत्यका वध करते हैं और ऋषियोंसे सम्मान पाकर भारतवर्षके प्रमुख तीर्थोंकी यात्रा करते हैं। बादमें वे भीम और दुर्योधनके गदायुद्धको रोकनेका प्रयास करते हैं, द्वारका लौटते हैं और पुनः नैमिषारण्यमें यज्ञ कराकर ऋषियोंको…

5 मिनट का पाठ930 शब्द
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अध्याय 80

श्रीकृष्णके द्वारा सुदामाजीका स्वागत

इस अध्यायमें परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्णकी और लीलाएँ सुनना चाहते हैं। श्रीशुकदेवजी सुदामाजीकी दरिद्र अवस्था, उनकी पत्नीकी प्रार्थना, सुदामाजीका द्वारका जाना और श्रीकृष्णद्वारा उनके अत्यन्त प्रेमपूर्ण स्वागतका वर्णन करते हैं। आगे श्रीकृष्ण और…

8 मिनट का पाठ1,443 शब्द
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अध्याय 81

सुदामाजीको ऐश्वर्यकी प्राप्ति

इस अध्यायमें भगवान् श्रीकृष्ण सुदामाजीसे उनके लाये चिउड़े प्रेमपूर्वक ग्रहण करते हैं और रुक्मिणीजी दूसरी मुट्ठी रोक देती हैं। सुदामाजी बिना कुछ माँगे लौटते हैं, पर घर पहुँचकर देखते हैं कि भगवान्की कृपासे उनका घर दिव्य ऐश्वर्यसे भर गया है। अ…

7 मिनट का पाठ1,341 शब्द
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अध्याय 82

भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामसे गोप-गोपियोंकी भेंट

इस अध्यायमें सूर्यग्रहणके अवसरपर समन्तपंचक कुरुक्षेत्रमें यदुवंशियों, राजाओं, नन्दादि गोपों और गोपियोंका संगम होता है। वसुदेव और कुन्तीका संवाद, नन्द-यशोदासे मिलन, तथा श्रीकृष्ण और गोपियोंका अत्यन्त प्रेमपूर्ण मिलन वर्णित है। अन्तमें श्रीकृ…

9 मिनट का पाठ1,740 शब्द
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अध्याय 83

भगवान् की पटरानियोंके साथ द्रौपदीकी बातचीत

इस अध्यायमें द्रौपदी भगवान् श्रीकृष्णकी रानियोंसे उनके विवाहका प्रसंग पूछती हैं। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा, लक्ष्मणा और रोहिणीजी अपने-अपने प्रसंग सुनाती हैं और सबकी भावना भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंकी से…

9 मिनट का पाठ1,652 शब्द
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अध्याय 84

वसुदेवजीका यज्ञोत्सव

इस अध्यायमें कुरुक्षेत्रमें ऋषियोंका आगमन, भगवान् श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार और संत-महिमा कही गयी है। ऋषिगण भगवान्की लीला और तत्त्वका वर्णन करते हैं। वसुदेवजी उनके उपदेशसे यज्ञ कराते हैं, अतिथियों और बन्धु-बान्धवोंका सम्मान करते हैं, तथा अ…

12 मिनट का पाठ2,291 शब्द
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अध्याय 85

श्रीभगवान् के द्वारा वसुदेवजीको ब्रह्मज्ञानका उपदेश तथा देवकीजीके छः पुत्रोंको लौटा लाना

इस अध्यायमें वसुदेवजी भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीसे ब्रह्मतत्त्वका वर्णन करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें नानात्व-बुद्धि छोड़नेका उपदेश देते हैं। देवकीजी अपने कंसद्वारा मारे गये पुत्रोंको देखनेकी इच्छा प्रकट करती हैं, तब श्रीकृष्ण-बलराम सु…

11 मिनट का पाठ2,028 शब्द
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अध्याय 86

सुभद्राहरण और भगवान् का मिथिलापुरीमें राजा जनक श्रुतदेव ब्राह्मणके घर एक ही साथ जाना

इस अध्यायमें परीक्षित् अर्जुन और सुभद्राजीके विवाहका प्रसंग पूछते हैं। अर्जुन त्रिदण्डी वैष्णवके वेषमें द्वारका जाकर सुभद्राजीका हरण करते हैं और श्रीकृष्णके समझानेसे बलरामजी शांत होते हैं। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण बहुलाश्व राजा और श्रुतदेव…

10 मिनट का पाठ1,937 शब्द
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अध्याय 87

वेदस्तुति

इस अध्यायमें परीक्षित् पूछते हैं कि निर्गुण ब्रह्मका प्रतिपादन श्रुतियाँ कैसे करती हैं। श्रीशुकदेवजी नारद और भगवान् नारायणके संवादके माध्यमसे सनकादि ऋषियोंकी वेदस्तुति सुनाते हैं। श्रुतियाँ परमात्माके निर्गुण, सर्वाधार, मायातीत और अभयस्वरूप…

20 मिनट का पाठ3,998 शब्द
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अध्याय 88

शिवजीका संकटमोचन

इस अध्यायमें परीक्षित् भगवान् शिव और भगवान् विष्णुके उपासकोंको मिलनेवाले भिन्न फलके विषयमें प्रश्न करते हैं। श्रीशुकदेवजी श्रीकृष्णके उत्तरके रूपमें बताते हैं कि भगवान् हरि अपने भक्तोंको गुणातीत बनाते हैं। फिर वृकासुरकी कथा आती है, जिसमें भ…

7 मिनट का पाठ1,377 शब्द
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अध्याय 89

भृगुजीके द्वारा त्रिदेवोंकी परीक्षा तथा भगवान्का मरे हुए ब्राह्मण-बालकोंको वापस लाना

इस अध्यायमें सरस्वती-तटपर ऋषियोंके संशयके समाधानके लिये भृगुजी ब्रह्मा, शिव और विष्णुकी परीक्षा करते हैं और भगवान् विष्णुकी सहनशीलता एवं श्रेष्ठता प्रकट होती है। इसके बाद द्वारकामें ब्राह्मणके बालकोंके मरने और अर्जुनकी प्रतिज्ञाका प्रसंग आत…

10 मिनट का पाठ1,978 शब्द
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अध्याय 90

भगवान् श्रीकृष्णके लीला-विहारका वर्णन

इस अध्यायमें द्वारकापुरीकी ऐश्वर्यमयी शोभा, भगवान् श्रीकृष्णका रानियोंके साथ जल-विहार, रानियोंका प्रेमोन्माद और विरह-वचन, भगवान्की पत्नियों-पुत्रों तथा यदुवंशकी महिमा वर्णित है। अन्तमें श्रीकृष्णकी दिव्य लीलाओंके श्रवण, कीर्तन और चिन्तनसे प…

11 मिनट का पाठ2,062 शब्द
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