वैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युम्नकी कथा
इस अध्याय में वैवस्वत मनुके वंशका प्रारम्भ, इला-सुद्युम्नकी उत्पत्ति, शिवके वनमें सुद्युम्नका स्त्रीभाव, बुधसे पुरूरवाका जन्म और वसिष्ठजीकी कृपासे सुद्युम्नको मास-मास स्त्री-पुरुषभाव मिलनेका वर्णन है।
कुल 24 अध्याय
इस अध्याय में वैवस्वत मनुके वंशका प्रारम्भ, इला-सुद्युम्नकी उत्पत्ति, शिवके वनमें सुद्युम्नका स्त्रीभाव, बुधसे पुरूरवाका जन्म और वसिष्ठजीकी कृपासे सुद्युम्नको मास-मास स्त्री-पुरुषभाव मिलनेका वर्णन है।
इस अध्याय में वैवस्वत मनुके पुत्रोंमें पृषध्र, कवि, करूष, धृष्ट, नृग, नरिष्यन्त और दिष्टके वंशका वर्णन है। पृषध्रकी गौहत्या, वसिष्ठजीका शाप, उसका ब्रह्मचर्य-व्रत तथा दिष्टवंशमें मरुत्त, तृणबिन्दु, विशाल और जनमेजयतक वंशपरम्परा कही गयी है।
इस अध्याय में राजा शर्याति, सुकन्या और महर्षि च्यवनका प्रसंग, अश्विनीकुमारोंद्वारा च्यवन मुनिके यौवन-प्राप्ति, इन्द्रका रोष, अश्विनीकुमारोंको सोमभाग, तथा रेवत-ककुद्मी-रेवती और बलरामजीसे विवाहका वर्णन है।
इस अध्याय में नाभागको भगवान् शंकरसे ब्रह्मज्ञान और धन प्राप्त होनेका प्रसंग, राजा अम्बरीषकी अनन्य भक्ति, एकादशी-व्रत, दुर्वासाजीका क्रोध, कृत्याका नाश, सुदर्शन चक्रका पीछा, और भगवान्का भक्तपराधीन स्वरूप वर्णित है।
इस अध्याय में भगवान्की आज्ञासे दुर्वासाजीका अम्बरीषके पास लौटना, अम्बरीषद्वारा सुदर्शन चक्रकी स्तुति, दुर्वासाजीकी जलनका शांत होना, भक्तमहिमा, और राजा अम्बरीषके वैराग्यका वर्णन है।
इस अध्याय में अम्बरीषके वंशसे रथीतर, इक्ष्वाकु, विकुक्षि, पुरंजय, युवनाश्व और मान्धाताका वंशवर्णन तथा सौभरि ऋषिके तप, विवाह, वैराग्य और परमगतिकी कथा वर्णित है।
इस अध्याय में पुरुकुत्स, त्रिशंकु और हरिश्चन्द्रकी वंशकथा, हरिश्चन्द्रका वरुणसे पुत्र-व्रत, रोहितका वनगमन, शुनःशेपका यज्ञपशुरूपमें लाया जाना और हरिश्चन्द्रकी परमगति वर्णित है।
इस अध्याय में बाहुकके वंशमें सगरका जन्म, सगरके पुत्रोंद्वारा पृथ्वीका खोदा जाना, कपिलमुनिके समीप उनका भस्म होना, असमंजस और अंशुमानकी कथा तथा सगरकी परमगति वर्णित है।
इस अध्याय में अंशुमान और दिलीपके बाद भगीरथकी तपस्या, गंगाजीका पृथ्वीपर अवतरण, सगरपुत्रोंका उद्धार, भगीरथसे आगेका वंश, सौदास-कल्माषपादकी कथा और राजा खटवांगकी भगवत्प्राप्ति वर्णित है।
इस अध्याय में खट्वांगसे दशरथतक वंश, भगवान् श्रीरामका अवतार, वनगमन, राक्षस-वध, सीताहरण, समुद्रसेतु, रावण-वध, अयोध्यागमन, राज्याभिषेक और रामराज्यका वर्णन है।
इस अध्याय में भगवान् श्रीरामके यज्ञ, ब्राह्मणोंके प्रति उनके आदर, सीताजीके परित्याग, कुश-लवके जन्म, श्रीरामके परमधामगमन, रामचरित्रके माहात्म्य और अयोध्याके वैभवका वर्णन है।
इस अध्याय में कुशसे आरम्भ होकर इक्ष्वाकुवंशके शेष राजाओंका क्रम, हिरण्यनाभ और याज्ञवल्क्यका प्रसंग, मरुका कलाप ग्राममें रहना तथा सुमित्रतक इस वंशके समाप्त होनेका वर्णन है।
इस अध्याय में राजा निमि और वसिष्ठजीके प्रसंग, निमिके विदेह रूप, जनक-मिथिलकी उत्पत्ति, सीरध्वजसे सीताजीकी उत्पत्ति तथा मैथिल राजाओंके वंश और आत्मज्ञानका वर्णन है।
इस अध्याय में चन्द्रवंशका आरम्भ, चन्द्रमा और ताराका प्रसंग, बुध और पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा-उर्वशीकी कथा, गन्धर्वोंकी लीला तथा त्रेतायुगमें वेदत्रयी और अग्नित्रयीके आविर्भावका वर्णन है।
इस अध्याय में पुरूरवाके वंशसे गाधि और सत्यवतीतक वंशक्रम, ऋचीक और सत्यवतीका प्रसंग, जमदग्नि और परशुरामजीका जन्म, सहस्रबाहु अर्जुनका ऐश्वर्य, कामधेनुहरण और परशुरामजीद्वारा सहस्रबाहु-वधका वर्णन है।
इस अध्याय में रेणुका और जमदग्नि प्रसंग, परशुरामजीद्वारा माता-भाइयोंका वध और पुनर्जीवन, जमदग्नि-वध, परशुरामजीका क्षत्रियसंहार, समन्तपंचक, जमदग्निका सप्तर्षि पद तथा विश्वामित्रजीके वंश और शुनःशेप-देवरातकी कथा वर्णित है।
इस अध्याय में आयुके पुत्रोंमें क्षत्रवृद्ध, रम्भ, अनेना और रजि आदि वंशोंका वर्णन है। इसमें धन्वन्तरि, दिवोदास, अलर्क, रजि और इन्द्रके प्रसंग सहित क्षत्रवृद्धकी वंश-परम्परा बतायी गयी है।
इस अध्याय में नहुषके पुत्रोंका वर्णन, ययातिका राज्य, देवयानी-शर्मिष्ठा प्रसंग, ययाति और देवयानीका विवाह, शुक्राचार्यका शाप, ययातिका बुढ़ापा और पूरुद्वारा पितृआज्ञापालनका वर्णन है।
इस अध्याय में राजा ययातिके वैराग्य, बकरेकी गाथाद्वारा विषयतृष्णाके दोष, पूरुको जवानी लौटाने, राज्य-विभाजन, वनगमन, आत्मसाक्षात्कार और देवयानीके भगवत्प्राप्ति प्रसंगका वर्णन है।
इस अध्याय में पूरुवंशकी वंशावली, राजा दुष्यन्त और शकुन्तलाका प्रसंग, भरतका जन्म, चक्रवर्ती भरतके यज्ञ और पराक्रम तथा भरद्वाजको दत्तक पुत्र रूपमें प्राप्त करनेका वर्णन है।
इस अध्याय में भरतवंशकी आगेकी वंशावली, राजा रन्तिदेवकी अतिथि-सेवा और करुणा, उनके भगवत्प्रेम, तथा गर्ग, हस्ती, अजमीढ, नीप, मुद्गल, दिवोदास, अहल्या, शतानन्द, शरद्वान्, कृपाचार्य और कृपी आदि वंशप्रसंगोंका वर्णन है।
इस अध्याय में पांचाल, कौरव और मगधदेशीय राजाओंकी वंशावली, जरासन्ध, शन्तनु, भीष्म, व्यास, धृतराष्ट्र-पाण्डु, पाण्डवोंके पुत्रों, परीक्षित् और जनमेजयके वंश तथा भविष्यके मगध राजाओंका वर्णन है।
इस अध्याय में अनु, द्रुह्यु, तुर्वसु और यदुके वंशका वर्णन, अंग-वंग-कलिंग आदि देश, रोमपाद और ऋष्यश्रृंग प्रसंग, कर्णके पालन, यदुवंश, कार्तवीर्य अर्जुन, तालजंघ, मधु-वृष्णि और ज्यामघ-शैब्या-विदर्भ प्रसंगका वर्णन है।
इस अध्यायमें विदर्भ, सात्वत, वृष्णि, अन्धक और यदुवंशकी वंशपरम्परा, वसुदेवजीके कुल, देवकीजीके पुत्रों तथा भगवान् श्रीकृष्णके अवतार और लीला-प्रयोजनका वर्णन है।