भैरव के रूप: बटुकभैरव (सौम्य-संकट), कालभैरव (उग्र-सिद्धि)। विधि: कालाष्टमी, रविवार, अर्धरात्रि। वस्त्र: काला/भगवा, रुद्राक्ष माला। मंत्र: बटुकभैरव ('ॐ ह्रीं बटुकाय... हूं'), कालभैरव ('ॐ हूं भैरवाय नमः' — 6 लाख)। भोग: उड़द-तिल, सरसों दीपक। फल: शत्रु-निवारण, क्षेत्र-रक्षण, अकाल-मृत्यु से रक्षा।
- 1बटुकभैरव — सौम्य, संकट-निवारक, सुलभ
- 2कालभैरव — काशी के क्षेत्रपाल, उग्र, सिद्धि-दाता
- 3स्वच्छन्दभैरव — कश्मीर शैव परंपरा में सर्वोच्च
- 4कालाष्टमी (कृष्ण-पक्ष अष्टमी) — प्रतिमास
- 5मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी (काल-भैरवाष्टमी) — वर्ष में सर्वोत्तम
- 6अर्धरात्रि (12 बजे) — नित्य जप के लिए
- 7रविवार — भैरव का वार
- 8काले या गेरुए वस्त्र
- 9रुद्राक्ष माला
- 10बटुकभैरव: 'ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं।' — संकट-निवारण
- 11कालभैरव: 'ॐ हूं भैरवाय नमः' — सामान्य साधना
- 12षोडशाक्षरी भैरव मंत्र — गुरु-दत्त
- 13क्षेत्र-रक्षण — साधक के क्षेत्र में नकारात्मक शक्तियाँ नहीं
- 14शत्रु-निवारण — शत्रु का प्रभाव नष्ट
- 15अकाल-मृत्यु से रक्षा
- 16न्याय में सफलता