गायत्री = 24 अक्षर → पुरश्चरण = 24 लाख जप। त्रिसंध्या उपासना सर्वोत्तम। साधना: सूर्यमुखी, लाल-पीले वस्त्र, स्फटिक माला, ब्रह्मचर्य। हवन (10वाँ भाग), तर्पण, मार्जन। ध्यान: हंसवाहिनी गायत्री देवी। सिद्धि: प्रकाश-अनुभव और बुद्धि-स्पष्टता।
- 1अर्थ: उस सविता देव के वरेण्य तेज का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।
- 2संख्या: 24 लाख जप (24 अक्षर × 1 लाख)
- 3नित्य जप: 1000 से 10,000 तक — साधक की क्षमता अनुसार
- 4काल: ब्रह्ममुहूर्त (4-6 बजे) — सर्वोत्तम। सूर्योदय और मध्याह्न-संध्या भी उपयुक्त।
- 5तीन संध्याएं: प्रातः, मध्याह्न, सायं — तीनों में जप करना 'त्रिसंध्या उपासना' कहलाती है।
- 6हवन: जप का 10वाँ भाग — 2.4 लाख आहुति — तिल, जौ, घी के साथ
- 7तर्पण: हवन का 10वाँ
- 8मार्जन: तर्पण का 10वाँ
- 9ब्राह्मण भोजन: मार्जन का 10वाँ
- 10सूर्य की ओर मुख करके बैठें
- 11लाल या पीले वस्त्र धारण करें
- 12स्फटिक माला (सर्वोत्तम), रुद्राक्ष, या तुलसी माला उपयोग करें
- 13सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य