गीता 14: सत्व = ज्ञान, प्रकाश, सुख (ऊर्ध्वगति); रजस् = आसक्ति, कामना, अशांति (मध्य गति); तमस् = अज्ञान, आलस्य, प्रमाद (अधोगति)। तीनों बांधते हैं। गुणातीत = तीनों से परे, समभावी। उपाय: सात्विक आहार, सत्संग, ध्यान से सत्व बढ़ाएं।
- 1स्वभाव — प्रकाश, ज्ञान, निर्मलता, सुख, शांति।
- 2बंधन — सुख और ज्ञान की आसक्ति से बांधता है ('सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ')।
- 3लक्षण — सभी द्वारों (इंद्रियों) से प्रकाश/ज्ञान विकीर्ण हो — सत्व प्रबल।
- 4फल — ऊर्ध्वगति (उच्च लोक), ज्ञान, प्रसन्नता।
- 5उदाहरण — ज्ञानी, साधु, सात्विक व्यक्ति।
- 6स्वभाव — आसक्ति, कामना, लालसा, अशांति, सक्रियता।
- 7बंधन — कर्मफल की आसक्ति से बांधता है ('कर्मसङ्गेन बध्नाति')।
- 8लक्षण — लोभ, प्रवृत्ति, आरंभ (नई-नई चीजें शुरू करना), अशांति।
- 9फल — मध्य गति (मनुष्य लोक), कर्म बंधन।
- 10उदाहरण — महत्वाकांक्षी, अस्थिर, लालची।
- 11स्वभाव — अज्ञान, आलस्य, प्रमाद, निद्रा, मोह।
- 12बंधन — अज्ञान और प्रमाद से बांधता है ('प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति')।
- 13लक्षण — अप्रकाश (अंधकार), अप्रवृत्ति (निष्क्रियता), प्रमाद (लापरवाही)।
- 14फल — अधोगति (निम्न योनि), अज्ञान, दुःख।
- 15उदाहरण — आलसी, अज्ञानी, प्रमादी।