गंगा अस्थि: मोक्षदायिनी (गरुड़ पुराण), विष्णु पादोदक (चरण स्पर्श), पापनाश, पुनर्जन्म मुक्ति। स्थान: हरिद्वार, प्रयागराज, काशी (शिव तारक मंत्र), गंगासागर। 3-10 दिन में। 'ॐ' सहित विसर्जन→तर्पण→पिण्डदान।
- 1गंगा = मोक्षदायिनी: गरुड़ पुराण: 'गंगायां यस्य अस्थीनि तिष्ठन्ति...' — जिसकी अस्थियाँ गंगा में हैं, वह मोक्ष प्राप्त करता है। गंगाजल = पापनाशिनी — अस्थि गंगा स्पर्श = मृतक के सम्पूर्ण पापों का क्षय।
- 2विष्णु पद से उत्पन्न: गंगा = विष्णु पादोदक (विष्णु के चरणों से)। अस्थि गंगा में = विष्णु चरण स्पर्श = परम पवित्र।
- 3पुनर्जन्म चक्र मुक्ति: मान्यता: गंगा में अस्थि विसर्जन से मृतक को सद्गति (उत्तम लोक/मोक्ष) प्राप्त होती है — पुनर्जन्म चक्र से मुक्ति।
- 4स्कन्द पुराण: 'गंगा गंगेति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।' — दूर से भी 'गंगा-गंगा' कहने से पाप नष्ट। तो अस्थि गंगा में = असीम पुण्य।