माया क्या है शंकराचार्य के अनुसार?
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माया = वह शक्ति जिससे एक ब्रह्म अनेक (जगत) दिखता है। न सत् न असत् — 'अनिर्वचनीय।' दो शक्तियाँ: आवरण (सत्य ढकना) और विक्षेप (भ्रम दिखाना)। जादूगर का जादू जैसी — ब्रह्म अप्रभावित। ब्रह्मज्ञान से माया नष्ट = मोक्ष।
- 1अनादि (Beginningless) — माया का कोई आदि (शुरुआत) नहीं — यह अनादि काल से है।
- 2अनिर्वचनीय (Indescribable) — यह न सत् है न असत्। सत् इसलिए नहीं क्योंकि ज्ञान से नष्ट हो जाती है; असत् इसलिए नहीं क्योंकि इसका अनुभव होता है।
- 3त्रिगुणात्मिका — माया सत्व, रजस और तमस तीन गुणों से युक्त है।
- 4ब्रह्म पर आश्रित — माया ब्रह्म की शक्ति है, ब्रह्म से पृथक नहीं, पर ब्रह्म माया से अप्रभावित (अस्पृष्ट) रहता है।
- 5आवरण शक्ति — ब्रह्म के सत्य स्वरूप को ढक देती है (जैसे बादल सूर्य को ढकता है)।
- 6विक्षेप शक्ति — ब्रह्म पर जगत का भ्रम प्रक्षेपित करती है (जैसे रस्सी पर साँप दिखना)।
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