गीता: सही स्थान-काल-पात्र + बिना प्रत्युपकार = सात्विक दान (श्रेष्ठ)। प्रकार: अन्न (सर्वोत्तम), धन (हुंडी), वस्त्र, गो-दान, तेल/घी। नियम: श्रद्धा, गोपनीयता, दाहिने हाथ से, सामर्थ्यानुसार। शुभ समय: एकादशी, संक्रांति, ग्रहण। दबाव/भय से दान = वर्जित।
- 1सही देश (स्थान), सही काल (समय), सही पात्र (योग्य व्यक्ति) को बिना किसी प्रत्युपकार की आशा से दिया गया दान = सात्विक।
- 2अन्न दान: मंदिर की रसोई/भंडारे के लिए — सर्वश्रेष्ठ ('अन्नदानं परं दानम्')
- 3धन दान: दान पेटी (हुंडी) में — मंदिर संचालन, गरीबों की सेवा
- 4वस्त्र दान: देवता को वस्त्र अर्पित करना या गरीबों को
- 5गो-दान: गाय दान — सर्वोच्च दान (ब्राह्मण/गौशाला को)
- 6स्वर्ण/रजत दान: देवता को — उत्तम
- 7तेल/घी दान: दीपक के लिए — प्रकाश दान
- 8पुष्प/फल दान: पूजा सामग्री
- 9श्रद्धा: बिना श्रद्धा का दान = व्यर्थ (गीता)
- 10गोपनीय: दान का प्रचार न करें — 'दाहिना हाथ दे, बाएँ को पता न चले'
- 11प्रत्युपकार रहित: बदले में कुछ न चाहें
- 12अपमानरहित: दान लेने वाले का अपमान न करें
- 13सामर्थ्य अनुसार: अपनी क्षमता के अनुसार — अत्यधिक न दें, न बहुत कम
- 14दक्षिण हाथ से: दान सदा दाहिने हाथ से दें
- 15एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या
- 16संक्रांति (मकर संक्रांति विशेष)
- 17ग्रहण काल
- 18सोमवती अमावस्या
- 19श्राद्ध पक्ष
- 20नवरात्रि, दीपावली, शिवरात्रि
- 21अन्न दान = पुण्य + स्वर्ग
- 22विद्या दान = सर्वोत्तम ('विद्यादानं सर्वदानेषु श्रेष्ठम्')
- 23गो-दान = पितृ तृप्ति
- 24धन दान = लक्ष्मी कृपा
- 25दान किसी दबाव या भय से न दें (ठग तांत्रिकों से सावधान)
- 26मंदिर की दान पेटी/हुंडी में ही दें — अनधिकृत व्यक्ति को नहीं
- 27दान रसीद/प्रमाण लें (बड़ी राशि का)
- 28तामसिक दान (अपमानपूर्वक, अयोग्य पात्र को) — गीता में निंदित