वस्त्र दान = महापुण्य (पद्मपुराण)। दो प्रकार: देवता को अर्पण (षोडशोपचार अंग) + निर्धन को (लज्जा-रक्षा = परम पुण्य)। नवीन-स्वच्छ दें, फटे/मैले नहीं। संक्रांति, ग्रहण, श्राद्ध — विशेष शुभ। फल: सौन्दर्य, यश, लक्ष्मी कृपा, पितर तृप्ति।
- 1मंदिर में देवता को — नवीन रेशमी/सूती वस्त्र (पूजा-उत्सव पर)
- 2मंदिर परिसर में निर्धनों को — सर्दी/त्योहारों पर
- 3संक्रांति (मकर संक्रांति) — वस्त्र दान विशेष शुभ
- 4ग्रहण काल — दान विशेष पुण्यदायक
- 5श्राद्ध पक्ष — ब्राह्मण/पुरोहित को
- 6नवीन और स्वच्छ वस्त्र दान करें — फटे/पुराने/मैले नहीं
- 7श्रद्धा और सम्मान से दें — दया भाव से नहीं
- 8देवता को वस्त्र — देवता-अनुकूल रंग (विष्णु=पीला, शिव=श्वेत, देवी=लाल)
- 9वस्त्र दान के साथ फल/मिठाई भी दें तो अतिरिक्त शुभ
- 10सौन्दर्य और यश प्राप्ति
- 11लक्ष्मी कृपा
- 12अगले जन्म में उत्तम वस्त्र/ऐश्वर्य
- 13पितर तृप्ति (श्राद्ध में)
- 14लज्जा-रक्षा का पुण्य = दीर्घकालीन