मंत्र जप से आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है?
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नाम और नामी अभेद (भागवत 11.14.26): जप-परिपाक = साधक-भगवान भेद मिटे। मार्ग: जप → अहंकार-क्षय → सोऽहं (प्रतिदिन 21,600 स्वतः) → तुरीय-बोध। विवेकचूडामणि: जप = श्रवण-मनन-निदिध्यासन की पूर्व-भूमिका। जप प्रत्यक्ष नहीं — भूमि तैयार करता है।
- 1तप (मंत्र-जप और साधना) से पाप नष्ट होते हैं और ज्ञानामृत मिलता है।
- 2नाम और नामी (भगवान) में कोई भेद नहीं। 'राम' नाम और राम-स्वरूप एक ही हैं। इसलिए जप के परिपाक पर साधक और भगवान की चेतना में भेद नहीं रहता — यही आत्मज्ञान है।
- 3श्वास लेते: 'सो' (वह ब्रह्म)
- 4श्वास छोड़ते: 'हं' (मैं)
- 5यह प्रतिदिन 21,600 बार स्वतः होता है।
- 6ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं। मंत्र-जप इस ज्ञान-प्राप्ति के लिए चित्त-शुद्धि करता है।
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मंत्र जप
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