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मंत्र जप📜 माण्डूक्य उपनिषद, भागवत पुराण (11.14.26-27), भगवद्गीता (4.33-38), मुण्डकोपनिषद (3.1.3), विवेकचूडामणि (आदि शंकराचार्य)2 मिनट पठन

मंत्र जप से आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है?

संक्षिप्त उत्तर

नाम और नामी अभेद (भागवत 11.14.26): जप-परिपाक = साधक-भगवान भेद मिटे। मार्ग: जप → अहंकार-क्षय → सोऽहं (प्रतिदिन 21,600 स्वतः) → तुरीय-बोध। विवेकचूडामणि: जप = श्रवण-मनन-निदिध्यासन की पूर्व-भूमिका। जप प्रत्यक्ष नहीं — भूमि तैयार करता है।

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विस्तृत उत्तर

मंत्र जप से आत्मज्ञान — ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग के संगम पर:

मुण्डकोपनिषद (3.1.3)

तपसा कल्मषं हन्ति विद्यामृतमश्नुते।

— तप (मंत्र-जप और साधना) से पाप नष्ट होते हैं और ज्ञानामृत मिलता है।

नाम और नामी की एकता (भागवत 11.14.26)

नाम नामिनोरभेदः।

— नाम और नामी (भगवान) में कोई भेद नहीं। 'राम' नाम और राम-स्वरूप एक ही हैं। इसलिए जप के परिपाक पर साधक और भगवान की चेतना में भेद नहीं रहता — यही आत्मज्ञान है।

अहंकार का विसर्जन

भगवद्गीता (4.33): 'सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।' — सभी कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं। मंत्र-जप से अहंकार क्षीण होता है — अहंकार क्षीण होने पर आत्मा का स्वरूप प्रकट होता है।

सोऽहं और माण्डूक्य उपनिषद

जब जप 'मानस' स्तर पर होता है — 'ॐ' का निरंतर स्मरण — तो चेतना 'तुरीय' (चौथी) अवस्था के निकट आती है। 'सोऽहं' (वह मैं हूँ) का अजपा जप — आत्मज्ञान का सीधा मार्ग है:

  • श्वास लेते: 'सो' (वह ब्रह्म)
  • श्वास छोड़ते: 'हं' (मैं)

— यह प्रतिदिन 21,600 बार स्वतः होता है।

विवेकचूडामणि — जप की पूर्वभूमिका

आदि शंकराचार्य: आत्मज्ञान के लिए श्रवण-मनन-निदिध्यासन तीन चरण अनिवार्य। मंत्र-जप इनकी पूर्वभूमिका है — शुद्ध और एकाग्र चित्त में ये तीनों शीघ्र फल देते हैं।

भगवद्गीता (4.38)

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

— ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं। मंत्र-जप इस ज्ञान-प्राप्ति के लिए चित्त-शुद्धि करता है।

जप से आत्मज्ञान का क्रम

जप → चित्त-शुद्धि → अहंकार-क्षय → श्रवण-मनन-निदिध्यासन → आत्म-साक्षात्कार

यथार्थ

मंत्र-जप प्रत्यक्ष आत्मज्ञान नहीं देता — यह भूमि तैयार करता है। जैसे हल चलाने से उपजाऊ भूमि बनती है — बीज (गुरु-कृपा और ज्ञान) अलग से चाहिए।

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शास्त्रीय स्रोत
माण्डूक्य उपनिषद, भागवत पुराण (11.14.26-27), भगवद्गीता (4.33-38), मुण्डकोपनिषद (3.1.3), विवेकचूडामणि (आदि शंकराचार्य)
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