विस्तृत उत्तर
मंत्र जप से भगवान के अनुभव का शास्त्रीय और अनुभवात्मक विवेचन:
नारद भक्तिसूत्र (51-57) — भगवद्-अनुभव की परिभाषा
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति अमृतो भवति तृप्तो भवति।
— जो पाकर मनुष्य सिद्ध होता है, अमर होता है, और तृप्त होता है — वह भगवद्-अनुभव है।
नाम और नामी में अभेद (भागवत 11.2.42)
नाम नामिनोरभेदः।
— नाम और नामी (भगवान) में कोई भेद नहीं। 'राम' नाम और राम-स्वरूप एक ही हैं। इसलिए गहरे जप में साधक भगवान के स्वरूप में ही डूब रहा होता है — यह अनुभव का तात्विक आधार है।
भगवद्-अनुभव के चार स्तर
1स्थूल अनुभव — मंत्र के आरंभिक फल
जप के दौरान या बाद में — असाधारण शांति, मन का हल्कापन, हृदय में प्रसन्नता। यह भगवत्-कृपा का स्थूल स्पर्श है।
2सूक्ष्म अनुभव — अष्टसात्विक भाव
कीर्तन-जप में आँखों में अश्रु, रोमांच, शरीर का स्वतः हिलना (स्पंदन)। भागवत में इन्हें 'अष्टसात्विक भाव' कहते हैं — स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय। ये भक्ति-रस के प्रकट होने के चिह्न हैं।
3स्वप्न और ध्यान में दर्शन
भागवत (11.14.24): मंत्र-सिद्धि के बाद — स्वप्न में इष्टदेव का स्पष्ट दर्शन। ध्यान में प्रकाश-मूर्ति का अनुभव।
4साक्षात् अनुभव — सर्वोच्च
भगवद्गीता (10.10-11): भगवान स्वयं उस साधक की बुद्धि में प्रकट होते हैं जो निरंतर प्रीतिपूर्वक जप करता है।
रामचरितमानस — तुलसीदास (बालकाण्ड दोहा 19)
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहु जो चाहसि उजियार।।'
— राम-नाम रूपी मणिदीप को जीभ रूपी द्वार पर रखो — अंदर-बाहर प्रकाश ही प्रकाश।
भगवद्-अनुभव के लिए शर्तें
- 1निरंतरता — नित्य जप, कभी न छूटे
- 2प्रेम — मंत्र को भगवान से प्रेम के रूप में जपें — यंत्रवत् नहीं
- 3समर्पण — 'मैं जप करता हूँ' यह अहंकार छोड़ें
- 4अपेक्षारहितता — अनुभव की माँग न करें
अंतिम सत्य
भगवद्-अनुभव 'खोजा' नहीं जाता। जब मन पर्याप्त शुद्ध और शांत होता है — भगवान स्वयं प्रकट होते हैं। मंत्र-जप वह शुद्धता और शांति देता है।





