सिद्धि-चिह्न (मंत्रमहार्णव): असाधारण गंध, स्पर्श-अनुभव, प्रकाश, स्वप्न में देवदर्शन, मंत्र का स्वतः स्फुरण। क्रम: प्रारंभ में शांति-प्रसन्नता, मध्यम में स्वप्न दर्शन और विद्युत-तरंगें, उन्नत में अजपा जप और वाणी-प्रभाव। कुलार्णव: अनुभव किसी को न बताएं।
- 1गंध, स्पर्श, प्रकाश, स्वप्न में देवदर्शन, और मंत्र का स्वतः स्फुरण — ये सिद्धि के छह चिह्न हैं।
- 2जप के दौरान असाधारण शांति और प्रसन्नता
- 3जप के बाद शरीर हल्का महसूस होना
- 4सुगंध (चंदन, फूल, या कस्तूरी की) बिना किसी स्रोत के
- 5जप के प्रति स्वाभाविक आसक्ति — जप छोड़ने की इच्छा न होना
- 6स्वप्न में इष्टदेव का दर्शन (स्पष्ट और जीवंत)
- 7ध्यान में प्रकाश-चक्र या देवमूर्ति का दर्शन
- 8शरीर में विद्युत-जैसी तरंगें (विशेषतः रीढ़ में)
- 9कुलार्णव (15.80): माला पर हाथ रखने मात्र से हथेली में गर्मी या स्पंदन
- 10जप बिना प्रयास के स्वतः होने लगे — 'अजपा जप'
- 11देवता की उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव
- 12वाणी में असाधारण प्रभाव — बोला हुआ सत्य हो जाए
- 13रुद्रयामल: साधक के आसपास के वातावरण में परिवर्तन — पशु-पक्षी भी निकट आएं