विस्तृत उत्तर
मंत्र-सिद्धि की यात्रा में साधकों को विभिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं — शास्त्र इन्हें 'सिद्धि-चिह्न' कहते हैं:
मंत्रमहार्णव — सिद्धि के पूर्व-संकेत
गंधः स्पर्शः प्रकाशश्च स्वप्ने देवदर्शनम्।
मंत्रे स्वतः स्फुरणं च सिद्धिचिह्नानि षट्।।'
— गंध, स्पर्श, प्रकाश, स्वप्न में देवदर्शन, और मंत्र का स्वतः स्फुरण — ये सिद्धि के छह चिह्न हैं।
क्रमिक अनुभव — स्तर-अनुसार
प्रारंभिक स्तर (1-3 माह)
- ▸जप के दौरान असाधारण शांति और प्रसन्नता
- ▸जप के बाद शरीर हल्का महसूस होना
- ▸सुगंध (चंदन, फूल, या कस्तूरी की) बिना किसी स्रोत के
- ▸जप के प्रति स्वाभाविक आसक्ति — जप छोड़ने की इच्छा न होना
मध्यम स्तर
- ▸स्वप्न में इष्टदेव का दर्शन (स्पष्ट और जीवंत)
- ▸ध्यान में प्रकाश-चक्र या देवमूर्ति का दर्शन
- ▸शरीर में विद्युत-जैसी तरंगें (विशेषतः रीढ़ में)
- ▸कुलार्णव (15.80): माला पर हाथ रखने मात्र से हथेली में गर्मी या स्पंदन
उन्नत स्तर
- ▸जप बिना प्रयास के स्वतः होने लगे — 'अजपा जप'
- ▸देवता की उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव
- ▸वाणी में असाधारण प्रभाव — बोला हुआ सत्य हो जाए
- ▸रुद्रयामल: साधक के आसपास के वातावरण में परिवर्तन — पशु-पक्षी भी निकट आएं
चेतावनी — क्या अनुभव का शोर न मचाएं
कुलार्णव (15.85): 'सिद्धिचिह्नं न वाच्यं स्यात्।' — सिद्धि के अनुभव किसी को न बताएं। बताने से शक्ति का ह्रास होता है।
भ्रामक अनुभव से सावधानी
तंत्रसार: कुछ अनुभव कल्पना, अधिक जप से थकान, या सात्विक स्वप्न हो सकते हैं। गुरु ही इनकी सही परख कर सकते हैं।





