क्षीरसागर = मन; मंदराचल = साधना; वासुकि = प्राण; देव-असुर = शुभ-अशुभ गुण; कूर्म = ईश्वर कृपा; हालाहल = साधना में उभरे विकार (शिव/ज्ञान ग्रहण करे); अमृत = आत्मज्ञान/मोक्ष। शिक्षा: विष (कठिनाई) अमृत (ज्ञान) से पहले आता है।
1क्षीरसागर (दूध का सागर) = मन/चेतना। मन में अमृत (ज्ञान) और विष (अज्ञान/विकार) दोनों छिपे हैं।
2मंदराचल पर्वत (मथानी) = ध्यान/साधना। साधना ही वह उपकरण है जो चेतना को मथता है।
3वासुकि नाग (रस्सी) = प्राण/श्वास। प्राणायाम — श्वास को खींचना और छोड़ना — मंथन की प्रक्रिया है।
4देव (दाहिना छोर) = सात्विक गुण/शुभ प्रवृत्तियां।
5असुर (बायां छोर) = तामसिक गुण/अशुभ प्रवृत्तियां।
6कूर्म अवतार (आधार) = भगवान का संबल। साधना में ईश्वर कृपा आधार है।
7हालाहल विष (पहले निकलता है) = साधना के प्रारंभ में विकार, कष्ट, नकारात्मकता उभरती है। इसे शिव (परम चेतना) ग्रहण करते हैं — अर्थात विकारों को ज्ञान से ग्रहण/नियंत्रित करो, न निगलो (उदर तक न जाने दो), न उगलो (दूसरों पर न थोपो) — इसीलिए शिव का कंठ नीला (नीलकंठ)।