संन्यास लिए बिना मोक्ष मिल सकता है क्या
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हाँ — गीता 5.2-6 'कर्मयोगो विशिष्यते' (कर्म योग संन्यास से श्रेष्ठ)। राजा जनक = गृहस्थ, जीवनमुक्त। असली संन्यास = आसक्ति का आंतरिक त्याग, गेरुआ वस्त्र नहीं। गृहस्थ रहकर निष्काम कर्म + भक्ति + वैराग्य = मोक्ष।
- 1सर्वत्र आसक्तिरहित, जितात्मा, इच्छारहित व्यक्ति संन्यास (आंतरिक त्याग) से परम सिद्धि प्राप्त करता है। यहां संन्यास = बाह्य गेरुआ वस्त्र नहीं, बल्कि आसक्ति का आंतरिक त्याग।
- 2राजा जनक — गृहस्थ, राजा, जीवनमुक्त।
- 3यम (धर्मराज) — गृहस्थ, न्यायाधीश।
- 4विदुर — गृहस्थ, महाभारत के ज्ञानी।
- 5गोपियां — साधारण गोपालक स्त्रियां, परम भक्ति।
- 6द्रौपदी — गृहस्थ, कृष्ण भक्ता।
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