श्रुति = ईश्वरीय, सर्वोच्च प्राधिकार, अपरिवर्तनीय (वेद, उपनिषद)। स्मृति = मनुष्य-रचित, श्रुति से कम प्राधिकार, परिवर्तनीय (स्मृति, पुराण, इतिहास)। विरोध हो तो श्रुति प्रमाण। गीता 'श्रुति-तुल्य' मानी जाती है।
- 1अर्थ: 'श्रुति' = सुनना। ऋषियों ने ध्यान में इन्हें ईश्वर से सीधे 'सुना' (दर्शन किया)।
- 2स्वरूप: अपौरुषेय (ईश्वरीय, मनुष्य-रचित नहीं)।
- 3प्राधिकार: सर्वोच्च। श्रुति सभी प्रमाणों में सर्वोपरि है।
- 4अपरिवर्तनीय: श्रुति में कोई परिवर्तन, संशोधन या जोड़-घटाव नहीं हो सकता।
- 5ग्रंथ: चारों वेद (ऋग्, यजुर्, साम, अथर्व) और उनके अंग — संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद।
- 6अर्थ: 'स्मृति' = स्मरण/याद। ऋषियों/मनीषियों ने श्रुति के ज्ञान को याद करके, अपने अनुभव और विवेक से रचा।
- 7स्वरूप: पौरुषेय (मनुष्य-रचित), श्रुति पर आधारित।
- 8प्राधिकार: श्रुति से कम। श्रुति और स्मृति में विरोध हो तो श्रुति प्रमाण मान्य होगा।
- 9परिवर्तनीय: काल, देश और परिस्थिति के अनुसार स्मृतियों में संशोधन संभव है।
- 10ग्रंथ: मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, रामायण, महाभारत, पुराण, भगवद्गीता, धर्मसूत्र, गृहसूत्र।