संध्या में ध्यान: गायत्री जप के साथ सविता (सूर्य तेज) का ध्यान। प्रातः = बालरूप गायत्री, मध्याह्न = सावित्री, सायं = सरस्वती (शाखा अनुसार)। भ्रूमध्य/हृदय पर ध्यान केन्द्रित, 'तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो' — दिव्य तेज की भावना। 28-108 बार जप। उपांशु (ओठ हिलें, ध्वनि सूक्ष्म)।
- 1प्रातः: बालरूप गायत्री (ब्रह्माणी) — लाल वर्ण, हंस वाहन।
- 2मध्याह्न: युवारूप सावित्री (वैष्णवी) — श्वेत वर्ण, गरुड वाहन।
- 3सायं: वृद्धरूप सरस्वती (शाम्भवी) — कृष्ण वर्ण, वृषभ वाहन।
- 4आँखें बन्द करें।
- 5श्वास सामान्य रखें।
- 6भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) या हृदय पर ध्यान केन्द्रित करें।
- 7गायत्री मंत्र जपते हुए सविता (सूर्य/प्रकाश) की भावना करें — 'तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि' — उस सविता के दिव्य तेज का ध्यान करें।
- 8'धियो यो नः प्रचोदयात्' — वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे — यह भावना रखें।