तारा महाविद्या की साधना कैसे करें और इसके क्या लाभ हैं?
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दूसरी महाविद्या — 'तारने वाली'। नीलवर्णा, वशिष्ठ प्रथम उपासक। बीज: 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट'। रात्रि साधना, नीला आसन/वस्त्र। लाभ: वाक् सिद्धि, आर्थिक+मोक्ष, ज्ञान। गुरु आवश्यक।
- 1गुरु दीक्षा अत्यंत अनुशंसित (सौम्य-उग्र)।
- 2रात्रि/मध्यरात्रि साधना काल।
- 3नीला आसन, नीले वस्त्र।
- 4बीज मंत्र: 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट' — 108/1008 जप।
- 5रुद्राक्ष/स्फटिक माला।
- 6चैत्र नवमी शुक्ल पक्ष — सर्वसिद्धिकारक (अमर उजाला)।
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श्रेणी
दशमहाविद्या
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