वस्त्रधारी = दक्षिणाचार: शुद्ध वस्त्र, सात्विक, शाकाहार, घर/मन्दिर, सभी हेतु। दिगम्बर = वामाचार: निर्वस्त्र, उग्र, पंचमकार, शमशान, केवल दीक्षित। लक्ष्य दोनों का एक = मोक्ष/शक्ति जागरण। दक्षिणाचार = सुरक्षित और अधिकांश हेतु उपयुक्त।
- 1साधक शुद्ध वस्त्र (प्रायः लाल, श्वेत, पीला) पहनकर साधना करता है।
- 2सात्विक मार्ग — शाकाहार, शुद्धता, नियम-संयम प्रधान।
- 3मंत्र जप, यंत्र पूजा, हवन, ध्यान — परम्परागत विधि से।
- 4सभी साधकों हेतु उपयुक्त — गृहस्थ भी कर सकते हैं।
- 5देवी (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती), शिव, विष्णु साधना।
- 6निर्वस्त्र अवस्था में साधना।
- 7उग्र/तामसिक मार्ग — पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) का प्रतीकात्मक/वास्तविक प्रयोग।
- 8शमशान/एकान्त में।
- 9दश महाविद्या (काली, तारा, छिन्नमस्ता आदि) की विशिष्ट साधना।
- 10केवल अत्यन्त उन्नत, दीक्षित साधकों हेतु।