विस्तृत उत्तर
तंत्र में साधना के दो प्रमुख मार्ग हैं — दक्षिणाचार (वस्त्रधारी/सात्विक) और वामाचार (दिगम्बर/उग्र)।
वस्त्रधारी साधना (दक्षिणाचार)
- ▸साधक शुद्ध वस्त्र (प्रायः लाल, श्वेत, पीला) पहनकर साधना करता है।
- ▸सात्विक मार्ग — शाकाहार, शुद्धता, नियम-संयम प्रधान।
- ▸मंत्र जप, यंत्र पूजा, हवन, ध्यान — परम्परागत विधि से।
- ▸सभी साधकों हेतु उपयुक्त — गृहस्थ भी कर सकते हैं।
- ▸देवी (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती), शिव, विष्णु साधना।
दिगम्बर साधना (वामाचार/कौलाचार)
- ▸निर्वस्त्र अवस्था में साधना।
- ▸उग्र/तामसिक मार्ग — पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) का प्रतीकात्मक/वास्तविक प्रयोग।
- ▸शमशान/एकान्त में।
- ▸दश महाविद्या (काली, तारा, छिन्नमस्ता आदि) की विशिष्ट साधना।
- ▸केवल अत्यन्त उन्नत, दीक्षित साधकों हेतु।
मुख्य अन्तर
| विषय | वस्त्रधारी | दिगम्बर |
|---|---|---|
| वस्त्र | शुद्ध वस्त्र | निर्वस्त्र |
| मार्ग | दक्षिणाचार (सात्विक) | वामाचार (उग्र) |
| आहार | शाकाहार | प्रतिबन्ध कम |
| स्थान | घर/मन्दिर | शमशान/एकान्त |
| अधिकारी | सभी | केवल दीक्षित |
| देवता | सभी | मुख्यतः दश महाविद्या |
ध्यान दें: दोनों मार्गों का लक्ष्य एक ही — आत्मज्ञान, मोक्ष, शक्ति जागरण। मार्ग भिन्न, गन्तव्य एक। 'दक्षिणाचार' अधिकांश साधकों के लिए उपयुक्त और सुरक्षित।