ईशावास्योपनिषद (1-2) — 'त्याग-भाव से भोगो, कर्म करते हुए जियो।' तैत्तिरीय (1/11) — 'सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः।' छान्दोग्य (7/26) — 'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।' उपनिषदों में आध्यात्मिक जीवन = कर्तव्य + वैराग्य + ध्यान + ब्रह्म-स्मरण।
- 1इस जगत में जो कुछ भी है — सब ईश्वर से व्याप्त है। त्याग-भाव से भोगो, लालच मत करो। यह किसका धन है?
- 2कर्म करते हुए जियो — कर्म त्याग नहीं, कर्म में ईश्वर की अनुभूति करो।
- 3सत्य बोलो — 'सत्यं वद'
- 4धर्म का पालन करो — 'धर्मं चर'
- 5स्वाध्याय में प्रमाद मत करो — 'स्वाध्यायान्मा प्रमदः'
- 6माता-पिता-गुरु को देव मानो
- 7अतिथि-सत्कार करो
- 8सत्कर्म ही करो — 'श्रद्धया देयम्'
- 9आहार शुद्ध हो तो मन शुद्ध होता है, मन शुद्ध हो तो स्मृति-शुद्धि और फिर ब्रह्म-ज्ञान।
- 10सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ध्यान
- 11दिन में सात्विक कर्म
- 12रात को श्रवण-मनन
- 13और हर क्षण 'मैं ब्रह्म हूँ' का बोध