उपनिषद में भक्ति का महत्व क्या है?
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श्वेताश्वतर उपनिषद (6/23) में 'यस्य देवे परा भक्तिः' — ईश्वर और गुरु में परम भक्ति हो तो ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है। मुण्डकोपनिषद (3/1/5) में आत्मा उसी के लिए प्रकट होती है जिसे वह चुनती है — यह चुनाव भक्ति और प्रेम पर आधारित है।
- 1जिस महात्मा की परमात्मा में परम भक्ति हो और गुरु में उसी के समान भक्ति हो — उसके लिए ही ये उपनिषद-वाक्य प्रकाशित होते हैं।
- 2आत्मा उसी के लिए अपने को प्रकट करती है जिसे वह चुनती है। यह 'चुनाव' भक्ति और प्रेम की तीव्रता पर आधारित है।
- 3आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न बहुत श्रवण से — वह उसी को मिलती है जिसे वह वरण करे। यह 'वरण' भक्त के प्रेम का उत्तर है।
- 4उपासना — देवमूर्ति या ब्रह्म के गुणों का ध्यान
- 5नाम-जप — ब्रह्म के नाम का निरंतर स्मरण (ॐ, सोऽहम्)
- 6श्रद्धा — गुरु और शास्त्र में अटूट विश्वास
- 7सम्पूर्ण समर्पण — 'आत्म-निवेदन' — ईश्वर को सब कुछ अर्पण
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