ऋग्वेद = होता का वेद — देवताओं की स्तुति और आह्वान। अथर्ववेद = ब्रह्मा (यज्ञ अध्यक्ष) का वेद — निरीक्षण, त्रुटि सुधार, मन से यज्ञ का दूसरा पक्ष संस्कारित। ऐतरेय ब्राह्मण: वेदत्रयी वाक् से, ब्रह्मा मन से यज्ञ पूर्ण करता है। दोनों अनिवार्य।
- 1ऋग्वेद = स्तुतिरूप ऋचाओं का संग्रह।
- 2होता का कार्य: इन्द्र, अग्नि, वरुण, सविता आदि देवताओं की स्तुति और प्रार्थना।
- 3सोमयाग में होता और उसके 3 सहायक (मैत्रावरुण, अच्छावाक, ग्रावस्तुत) ऋग्वैदिक मंत्रों का पाठ करते हैं।
- 4'शस्त्र' (ऋग्वैदिक मंत्रों का पठन) होता का विशिष्ट कर्तव्य है।
- 5ब्रह्मा सर्ववेदविद् होता है — चारों वेदों का ज्ञाता।
- 6उसका कार्य: यज्ञ की समस्त विधियों का निरीक्षण और त्रुटियों का परिमार्जन।
- 7ऐतरेय ब्राह्मण: वेदत्रयी (ऋक्, यजुः, साम) वाक् (वचन) से यज्ञ के एक पक्ष का संस्कार करती है, ब्रह्मा अथर्ववेद द्वारा मन से दूसरे पक्ष का संस्कार करता है।
- 8गोपथ ब्राह्मण: तीन वेदों से यज्ञ का केवल एक पक्ष संस्कारित होता है, ब्रह्मा मन द्वारा दूसरे पक्ष को संस्कारित करता है।
- 9अथर्ववेद के मंत्र शान्ति, रक्षा, और प्रायश्चित्त कर्मों में भी प्रयुक्त होते हैं।