ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
टैग

गुरु वन्दना से जुड़े सभी प्रश्न(4)

गुरु वन्दना पर शास्त्रीय व्याख्या, विधि, नियम, मंत्र और लाभ — सब एक ही स्थान पर। कुल 4 प्रश्न उपलब्ध हैं।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती' — इसका क्या अर्थ है?

अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करता है और जिसके हृदय में आ जाये उसके बड़े भाग्य हैं।

#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#चौपाई
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को किसका सुन्दर चूर्ण कहा है?

गुरु के चरणों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमृत मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा गया है, जो सम्पूर्ण भवरोगों (संसार के दुखों) के परिवार को नष्ट करने वाला है।

#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#चरण रज
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि' — इसमें गुरु को क्या कहा गया है?

इस दोहे में गुरु को 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् भगवान विष्णु) कहा गया है। गुरु के वचनों को महामोह रूपी अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें बताया गया।

#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#नररूप हरि
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने गुरु की वन्दना में गुरु के चरणकमल की तुलना किससे की है?

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की तीन उपमाएँ दीं — (1) गुरु के वचनों को महामोह-अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें, (2) गुरु के चरण-रज को संजीवनी जड़ी (अमृत मूल) का सुन्दर चूर्ण, और (3) गुरु के चरण-नखों को मणियों की ज्योति।

#बालकाण्ड#गुरु वन्दना#चरणकमल
सम्पूर्ण प्रश्नोत्तरी
सभी प्रश्न देखें

10,000+ शास्त्रीय प्रश्नोत्तर — श्रेणी, हब और टैग में सजे।

टैग खोज
अन्य टैग देखें

पूजा, मंत्र, साधना, उपाय, ज्योतिष — विषय अनुसार छाँटे गए सभी टैग।