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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ

अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है।

संक्षिप्त उत्तर

अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करता है और जिसके हृदय में आ जाये उसके बड़े भाग्य हैं।

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विस्तृत उत्तर

इस चौपाई का अर्थ है — श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है।

आगे की चौपाई में कहा — 'दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥' अर्थात् वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं।

इसमें तुलसीदासजी ने गुरु के पैरों के नाखूनों को मणियों (रत्नों) की चमक से तुलना की है। जैसे मणि अन्धकार में भी प्रकाश देती है, वैसे ही गुरु के चरणों का स्मरण मात्र हृदय में ज्ञान का प्रकाश (दिव्य दृष्टि) उत्पन्न कर देता है और अज्ञान का अन्धकार मिट जाता है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती' — इसका क्या अर्थ है को संदर्भ सहित समझें

'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती' — इसका क्या अर्थ है का सबसे सीधा सार यह है: अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञान रूपी...

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