'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती' — इसका क्या अर्थ है?
का सरल उत्तर
सरल उत्तर
अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करता है और जिसके हृदय में आ जाये उसके बड़े भाग्य हैं।
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रामचरितमानस — बालकाण्ड
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