विस्तृत उत्तर
तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा है।
चौपाई है — 'बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥'
इसका अर्थ — मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ जो सुरुचि (सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है।
जैसे संजीवनी बूटी का चूर्ण सभी रोगों को नष्ट करता है, वैसे ही गुरु के चरणों की धूलि संसार के सभी रोगों (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि) को नष्ट कर देती है।





