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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को किसका सुन्दर

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा है।

संक्षिप्त उत्तर

गुरु के चरणों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमृत मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा गया है, जो सम्पूर्ण भवरोगों (संसार के दुखों) के परिवार को नष्ट करने वाला है।

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विस्तृत उत्तर

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा है।

चौपाई है — 'बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥'

इसका अर्थ — मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ जो सुरुचि (सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है।

जैसे संजीवनी बूटी का चूर्ण सभी रोगों को नष्ट करता है, वैसे ही गुरु के चरणों की धूलि संसार के सभी रोगों (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि) को नष्ट कर देती है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को किसका सुन्दर चूर्ण कहा है को संदर्भ सहित समझें

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को किसका सुन्दर चूर्ण कहा है का सबसे सीधा सार यह है: गुरु के चरणों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमृत मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा गया है, जो सम्पूर्ण भवरोगों (संसार के दुखों) के...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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