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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि'

इस दोहे में गुरु को 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् भगवान विष्णु) कहा गया है।

संक्षिप्त उत्तर

इस दोहे में गुरु को 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् भगवान विष्णु) कहा गया है। गुरु के वचनों को महामोह रूपी अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें बताया गया।

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विस्तृत उत्तर

इस दोहे में गुरु को दो विशेषणों से सम्बोधित किया गया है — 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् श्रीहरि/भगवान विष्णु)।

पूरा दोहा — 'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥'

इसका अर्थ — मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करने के लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं।

यहाँ तुलसीदासजी ने हिन्दू परम्परा के अनुसार गुरु को भगवान का ही स्वरूप माना है — 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः' की भावना के अनुसार। गुरु के वचनों की तुलना सूर्य-किरणों से इसलिये की गई क्योंकि जैसे सूर्य अन्धकार मिटाता है, वैसे ही गुरु के वचन अज्ञान (महामोह) का नाश करते हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि' — इसमें गुरु को क्या कहा गया है को संदर्भ सहित समझें

'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि' — इसमें गुरु को क्या कहा गया है का सबसे सीधा सार यह है: इस दोहे में गुरु को 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् भगवान विष्णु) कहा गया है। गुरु के वचनों को महामोह रूपी...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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