विस्तृत उत्तर
इस दोहे में गुरु को दो विशेषणों से सम्बोधित किया गया है — 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् श्रीहरि/भगवान विष्णु)।
पूरा दोहा — 'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥'
इसका अर्थ — मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करने के लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं।
यहाँ तुलसीदासजी ने हिन्दू परम्परा के अनुसार गुरु को भगवान का ही स्वरूप माना है — 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः' की भावना के अनुसार। गुरु के वचनों की तुलना सूर्य-किरणों से इसलिये की गई क्योंकि जैसे सूर्य अन्धकार मिटाता है, वैसे ही गुरु के वचन अज्ञान (महामोह) का नाश करते हैं।





